हल्द्वानी। वैदिक सनातन धर्म के प्रमुख पर्वों में शामिल गुरु पूर्णिमा (व्यास पूर्णिमा) इस वर्ष 29 जुलाई, बुधवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। इस दिन गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि वेदव्यास के जन्मोत्सव के रूप में मनाए जाने के कारण इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

ज्योतिषाचार्य डा. नवीन चंद्र जोशी के अनुसार पूर्णिमा तिथि 29 जुलाई को सूर्योदय से रात्रि 8:05 बजे तक रहेगी, इसलिए गुरु पूर्णिमा का व्रत, पूजन और धार्मिक अनुष्ठान इसी दिन किए जाएंगे।
गुरु को माना गया है ज्ञान का प्रकाश
सनातन परंपरा में गुरु को ईश्वर के समान स्थान दिया गया है। शास्त्रों के अनुसार गुरु वह हैं, जो अज्ञान रूपी अंधकार से निकालकर ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं। बिना गुरु के न तो सच्चे ज्ञान की प्राप्ति संभव है और न ही आध्यात्मिक उन्नति।
शास्त्रों में कहा गया है “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।” अर्थात गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के स्वरूप हैं तथा वे स्वयं परब्रह्म के समान पूजनीय हैं।
महर्षि वेदव्यास की जयंती का भी पर्व
धार्मिक मान्यता है कि महर्षि श्रीकृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया तथा महाभारत और अठारह पुराणों की रचना कर मानव समाज को ज्ञान का अमूल्य प्रकाश प्रदान किया। ऋषि-मुनियों ने उनकी जयंती को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाने की परंपरा शुरू की, जो आज भी पूरे देश में श्रद्धापूर्वक निभाई जाती है।
गुरु पूर्णिमा पर किए जाते हैं ये धार्मिक अनुष्ठान
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालु अपने गुरु का पूजन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। कई स्थानों पर अखंड रामायण पाठ, रुद्राभिषेक, हवन, भजन-कीर्तन और सत्संग का आयोजन किया जाता है। शिष्यों द्वारा अपने गुरु को वस्त्र, फल, दक्षिणा और अन्य उपहार अर्पित कर आशीर्वाद लेने की भी परंपरा है।
गुरु के बताए मार्ग पर चलना ही सच्ची श्रद्धा
धर्मग्रंथों के अनुसार गुरु का सम्मान केवल पूजन तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके द्वारा बताए गए सत्य, सदाचार और धर्म के मार्ग पर चलना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा और समर्पण माना गया है। भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण ने भी गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण कर गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को स्थापित किया था।

