44 साल की सैन्य सेवा के बाद सीडीएस जनरल अनिल चौहान को विदाई, बोले- कार्यकाल रहा संतोषजनक

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नई दिल्ली। देश के दूसरे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने शनिवार को अपने कार्यकाल को बेहद संतोषजनक और शानदार बताया। करीब तीन वर्ष आठ महीने तक देश के सर्वोच्च सैन्य पद पर रहने के बाद उन्होंने औपचारिक रूप से विदाई ली। रविवार को एनएस राजा सुब्रमणि नए सीडीएस के रूप में पदभार ग्रहण करेंगे।

त्रि-सेवा गार्ड ऑफ ऑनर के बाद मीडिया से बातचीत में जनरल चौहान ने कहा कि उनका कार्यकाल यादगार रहा और इस दौरान उन्होंने तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की दिशा में लगातार काम किया। उन्होंने कहा कि गार्ड ऑफ ऑनर के साथ सेवानिवृत्त होना उनके लिए गर्व और सम्मान का विषय है।

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सितंबर 2022 में सीडीएस का पद संभालने वाले जनरल चौहान ने पूर्व सीडीएस बिपिन रावत की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु के बाद यह जिम्मेदारी संभाली थी। अपने कार्यकाल में उन्होंने बदलते सुरक्षा परिदृश्य को देखते हुए तीनों सेनाओं की संयुक्त क्षमता को मजबूत बनाने पर विशेष जोर दिया। इसके साथ ही एकीकृत सैन्य कमानों के गठन और थिएटराइजेशन मॉडल को आगे बढ़ाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल की।

जनरल चौहान ने विदाई से पहले राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर जाकर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि सैन्य वर्दी में यह उनका अंतिम आधिकारिक कार्यक्रम था और यह उन वीर जवानों के प्रति सम्मान का प्रतीक है जिन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

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फरवरी 2019 में पाकिस्तान के बालाकोट स्थित आतंकी ठिकानों पर भारतीय वायुसेना की कार्रवाई के दौरान जनरल चौहान सैन्य संचालन महानिदेशक (डीजीएमओ) के पद पर तैनात थे। माना जाता है कि उस अभियान की रणनीतिक योजना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।

वर्ष 1981 में भारतीय सेना की 11 गोरखा राइफल्स में कमीशन प्राप्त करने वाले जनरल चौहान ने अपने 44 वर्षों के सैन्य करियर में जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत में कई अहम जिम्मेदारियां निभाईं। उन्होंने बारामूला सेक्टर में इन्फैंट्री डिवीजन, पूर्वोत्तर में कोर और बाद में पूर्वी कमान का नेतृत्व भी किया।

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उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें परम विशिष्ट सेवा पदक, उत्तम युद्ध सेवा पदक, अति विशिष्ट सेवा पदक, सेना पदक और विशिष्ट सेवा पदक सहित कई प्रतिष्ठित सैन्य सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। सैन्य सुधारों और तीनों सेनाओं के बीच समन्वय बढ़ाने में उनके योगदान को भारतीय रक्षा इतिहास में महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में याद किया जाएगा।

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