महिला सैन्य अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, स्थायी कमीशन से वंचित अधिकारियों को मिलेगी पेंशन

खबर शेयर करें

नई दिल्ली। Supreme Court of India ने भारतीय सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत सेवा दे चुकी महिला अधिकारियों के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने माना कि सेना में महिलाओं के साथ “प्रणालीगत भेदभाव” हुआ है और इसी के चलते उन्हें स्थायी कमीशन (Permanent Commission) से वंचित रखा गया।

कोर्ट ने अपने विशेष संवैधानिक अधिकार Article 142 का इस्तेमाल करते हुए कहा कि जिन महिला अधिकारियों ने सेवा से हटाए जाने को चुनौती दी थी, उन्हें 20 वर्ष की सेवा के बराबर पेंशन का अधिकार मिलेगा। यह फैसला उन महिलाओं के लिए बड़ी राहत है, जो लंबे समय से न्याय की लड़ाई लड़ रही थीं।

यह भी पढ़ें 👉  GYAN मॉडल पर आगे बढ़ेगा उत्तराखंड, बजट में गरीब-युवा-किसान-महिलाओं के सशक्तिकरण पर बड़ा फोकस

अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सेना केवल पुरुषों का क्षेत्र नहीं है और पुरुष अधिकारी यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि भविष्य के सभी अवसर सिर्फ उनके लिए सुरक्षित रहेंगे। कोर्ट के अनुसार, सीमित अवसर और गलत तरीके से अयोग्य घोषित किए जाने के कारण महिला अधिकारियों के करियर और उनकी योग्यता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

यह भी पढ़ें 👉  अग्निवीर भर्ती: आवेदन की अंतिम तिथि 25 अप्रैल तक बढ़ी, युवाओं को मिली बड़ी राहत

यह निर्णय विशेष रूप से उन महिला अधिकारियों के लिए “वन-टाइम उपाय” के रूप में लागू होगा, जो कानूनी प्रक्रिया के दौरान सेवा से बाहर हो गई थीं। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश Judge Advocate General (JAG) और Army Education Corps (AEC) कैडर की महिला अधिकारियों पर लागू नहीं होगा।

साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य में पारदर्शिता और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए चयन प्रक्रिया और कट-ऑफ मानकों की समीक्षा करने का निर्देश भी दिया है।

यह भी पढ़ें 👉  लखनऊ के लाल शुभांशु शुक्ला की पृथ्वी पर वापसी, परिवार ने दीपों से सजाया घर, दुआओं में डूबी मां की आंखें

दरअसल, यह मामला तब सामने आया जब कई महिला अधिकारियों—जिनमें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से जुड़ी अधिकारी भी शामिल थीं—ने आरोप लगाया कि पूर्व आदेशों के बावजूद केंद्र सरकार और सेना उन्हें पुरुषों के बराबर स्थायी कमीशन नहीं दे रही है। इस याचिका पर सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने यह अहम फैसला सुनाया।

यह निर्णय भारतीय सेना में लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

You cannot copy content of this page