‘पहले जंगल, फिर परिवार’ की मिसाल रहीं बचनी देवी का निधन…चिपको आंदोलन की साहसी नायिका को भावभीनी विदाई

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देहरादून/नरेंद्रनगर। उत्तराखंड के पर्यावरण इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय आज बंद हो गया। हेंवलघाटी के चिपको आंदोलन की साहसी नायिका बचनी देवी का 100 वर्ष की आयु में निधन हो गया। शनिवार को देहरादून स्थित आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली, जबकि रविवार को पैतृक घाट शिवपुरी में उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके निधन से क्षेत्र में शोक की लहर है।

विकासखंड नरेंद्रनगर के अदवाणी गांव निवासी बचनी देवी ने उस दौर में पर्यावरण संरक्षण की अलख जगाई, जब जंगलों के अंधाधुंध कटान के खिलाफ आवाज उठाना आसान नहीं था। वर्ष 1977 में अदवाणी क्षेत्र में जब सरकार ने जंगलों के व्यावसायिक कटान की अनुमति दी, तब उन्होंने आंदोलन का बिगुल फूंक दिया। इस संघर्ष में वे धूम सिंह नेगी, विजय जड़धारी और सुदेशा बहिन जैसे नेताओं के साथ मजबूती से खड़ी रहीं।

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सबसे खास बात यह रही कि उस समय उनके पति गांव के प्रधान और जंगलों के ठेकेदार थे, लेकिन बचनी देवी ने बिना झिझक अपने ही परिवार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उनका साफ कहना था—“परिवार बाद में, पहले जंगलों को बचाना है।” यह साहसिक निर्णय उन्हें आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में ले आया।

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उन्होंने न केवल खुद आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई, बल्कि क्षेत्र की महिलाओं को भी संगठित किया। कई दिनों तक परिवार और समाज के विरोध के बावजूद वे अपने संकल्प पर अडिग रहीं। उनके प्रयासों का ही परिणाम था कि अंततः सरकार को अदवाणी क्षेत्र में जंगलों के कटान पर रोक लगानी पड़ी।

चिपको नेता विजय जड़धारी ने कहा कि बचनी देवी ने चिपको आंदोलन के मूल दर्शन को आत्मसात करते हुए जो कार्य किए, वे आज भी प्रेरणादायक हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बचनी देवी का प्रकृति से गहरा जुड़ाव ही उनके लंबे जीवन का आधार रहा।

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बचनी देवी अपने पीछे पांच पुत्रों और दो पुत्रियों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गई हैं। उनके निधन पर धूम सिंह नेगी, विजय जड़धारी, सुदेशा बहिन, रघुभाई जड़धारी, दयाल सिंह भंडारी, डीपी उनियाल, राजेंद्र भंडारी, सूरज राणा, साब सिंह सजवाण, कुसुम रावत, राजेंद्र नेगी, रवि गुसाईं, सिद्धार्थ समीर और विपिन जड़धारी सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गहरी शोक संवेदना व्यक्त करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।

बचनी देवी का जीवन संघर्ष, साहस और प्रकृति के प्रति समर्पण की ऐसी मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

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