Uttarakhand: सरकार का चाबुक चला तो गुटखा-पान मसाला कारोबार में हड़कंप, अब सिस्टम की बारी!

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हल्द्वानी। उत्तराखंड सरकार ने गुटखा-पान मसाला पर एक साल का प्रतिबंध क्या लगाया, हल्द्वानी में लंबे समय से चल रहे इस कारोबार पर संकट के बादल मंडराने लगे। बाहरी राज्यों से टैक्स चोरी कर गुटखा, पान मसाला लाने के कथित खेल से जुड़े कारोबारियों और ट्रांसपोर्टरों को सरकार के फैसले से बड़ा झटका लगा है। लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल कारोबारियों से ज्यादा उस सिस्टम पर है, जिसके जिम्मे टैक्स चोरी रोकना है। जब सीमाओं पर चेक पोस्ट हैं, अधिकारियों की टीमें गश्त करती हैं और मालवाहक वाहनों की जांच के दावे किए जाते हैं, तो फिर माल शहर के गोदामों तक पहुंचता कैसे रहा?

कुमाऊं के प्रवेश द्वार हल्द्वानी का ट्रांसपोर्ट नगर लंबे समय से माल की आवाजाही का प्रमुख केंद्र है। विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक, इसी ट्रांसपोर्ट कारोबार की आड़ में बाहरी राज्यों से गुटखा, पान मसाला और तंबाकू उत्पादों की खेप बंद बॉडी वाहनों से गोदामों तक पहुंचाई जाती रही है। कई-कई नग माल लेकर बड़े ट्रक पहुंचने की जानकारी है। एक नग की कीमत करीब 24 से 25 हजार रुपये और वजन 15 से 20 किलोग्राम तक बताया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब माल की मात्रा इतनी बड़ी हो सकती है, तो उसकी आवाजाही और दस्तावेजों की जांच करने वाला तंत्र आखिर किस काम में लगा है?

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कहानी केवल गुटखा-पान मसाला तक सीमित नहीं है। परचून, कॉस्मेटिक, जूते, कपड़े और दूसरे सामान की आवाजाही में भी टैक्स चोरी की बात सामने आती रही है। हल्द्वानी के साथ रुद्रपुर, किच्छा और काशीपुर तक इस कारोबार की पड़ताल किए जाने की जरूरत है। यदि सरकारी खजाने को चूना लगाने का खेल चल रहा है, तो इसकी कीमत आखिरकार प्रदेश के राजस्व को ही चुकानी पड़ती है।

सबसे दिलचस्प सवाल बॉर्डर की निगरानी को लेकर है। सीमाओं पर चेक पोस्ट, वाहनों की जांच और विभागीय गश्त—व्यवस्था के ये सारे इंतजाम कागजों पर मौजूद हैं। इसके बावजूद यदि माल गोदामों तक पहुंच रहा है, तो चूक कहां है? क्या वाहनों के बिल और ई-वे बिल की जांच प्रभावी ढंग से होती है? क्या गोदामों में रखे स्टॉक का दस्तावेजों से मिलान किया जाता है? या फिर निगरानी का तंत्र माल की आवाजाही के आगे बेबस है?

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सूत्रों के मुताबिक, इस कथित कारोबार को लेकर राज्य कर विभाग के कुछ अधिकारियों और कारोबारियों के बीच सांठगांठ की बात भी सामने आई है। एक व्यापारी की विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी से नजदीकी और कारोबारियों की शिकायतें नहीं करने के बदले कथित कमीशन वसूली की जानकारी भी सामने आई है। सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अधिकारियों पर दबाव बनाने की बात भी कही जा रही है। इन पहलुओं की जांच से ही स्पष्ट होगा कि कहीं व्यवस्था के भीतर बैठे लोगों की भूमिका तो इस पूरे मामले को प्रभावित नहीं कर रही।

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सरकार के प्रतिबंध ने कारोबार पर चोट की है, लेकिन अब असली परीक्षा विभागीय व्यवस्था की है। पहले से मौजूद माल की जांच, गोदामों के रिकॉर्ड का सत्यापन और बाहरी राज्यों से आने वाले वाहनों की निगरानी के बिना प्रतिबंध का प्रभाव अधूरा रह सकता है। यदि कर चोरी की आशंकाएं सही हैं, तो केवल माल पकड़ना काफी नहीं होगा, यह भी पता लगाना होगा कि माल किस रास्ते से आया, किसने मंगाया और निगरानी के बावजूद वह शहर तक कैसे पहुंचा।

आखिर सिस्टम से बड़ा कौन? सरकार ने प्रतिबंध लगाकर अपना फैसला सुना दिया है। अब राज्य कर विभाग को यह बताना होगा कि सीमाओं पर पहरे के बावजूद कथित कारोबार कैसे चलता रहा। कार्रवाई केवल छोटे कारोबारियों तक सीमित रहती है या पूरे नेटवर्क और उसकी निगरानी में हुई चूक तक पहुंचती है यही तय करेगा कि सरकारी आदेश वास्तव में कितना असरदार है।

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