हल्द्वानी रेलवे भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- ‘अतिक्रमणकारियों को उस जमीन पर रहने का अधिकार नहीं’

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पीएम आवास योजना के तहत पुनर्वास का विकल्प, 31 मार्च तक आवेदन करने पर जोर

नई दिल्ली/हल्द्वानी। Supreme Court of India ने मंगलवार को हल्द्वानी में रेलवे की भूमि पर अतिक्रमण के मामले में स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि वहां रहने वाले लोगों को उस जमीन पर बने रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

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इस पर न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि “यह रेलवे की सार्वजनिक भूमि है। आप इसे रहने का अधिकार नहीं कह सकते। यह केवल अधिकारियों की उदारता का परिणाम है कि वर्षों तक अवैध गतिविधियों को नजरअंदाज किया गया।”
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अदालत रेलवे को परियोजना स्थानांतरित करने का निर्देश नहीं दे सकती, क्योंकि यह विशेषज्ञों का विषय है।

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एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने धार्मिक स्थलों और पुनर्वास की आवश्यकता का मुद्दा उठाया। इस पर न्यायालय ने कहा कि खराब परिस्थितियों में रह रहे लोगों को बेहतर आवास का अवसर दिया जाना चाहिए और यदि कोई बाधा आती है तो अदालत हस्तक्षेप करेगी।

रेलवे और केंद्र का पक्ष
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि हल्द्वानी रेलवे विस्तार के लिए अंतिम समतल क्षेत्र है, क्योंकि इसके बाद पहाड़ी इलाका शुरू हो जाता है उन्होंने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व मानसून में नदी का पानी पटरियों में घुस गया था, जिससे बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा।

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सरकार ने कहा कि पात्र विस्थापित परिवारों को उत्तराखंड या उत्तर प्रदेश में पीएमएवाई के तहत आवास दिया जा सकता है। आवश्यकता होने पर छह महीने तक प्रति माह 2,000 रुपये की सहायता भी दी जाएगी। 13 निवासियों की निजी भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया भी राज्य सरकार द्वारा की जाएगी।

अप्रैल में अगली सुनवाई
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई अप्रैल तक स्थगित कर दी है। उल्लेखनीय है कि 24 जुलाई 2024 को भी शीर्ष अदालत ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव को पुनर्वास के लिए केंद्र और रेलवे अधिकारियों के साथ बैठक करने के निर्देश दिए थे।

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