हल्द्वानी। कुमाऊं का प्रसिद्ध ऐतिहासिक और पौराणिक पर्व अमुक्ताभरण सप्तमी यानी सातूं इस वर्ष 19 अगस्त 2026, बुधवार को मनाया जाएगा। इसके अगले दिन 20 अगस्त, गुरुवार को दूर्वाष्टमी यानी आठूं का व्रत रखा जाएगा। कुमाऊं की लोक परंपरा और धार्मिक आस्था में सातूं-आठूं पर्व का विशेष महत्व है। खासतौर पर महिलाएं अखंड सौभाग्य, सुख-समृद्धि और संतान की वृद्धि की कामना के लिए इन व्रतों का विधि-विधान से पालन करती हैं।
19 अगस्त को सातूं का पर्व
पंडित डॉ. नवीन चंद्र जोशी के अनुसार अमुक्ताभरण सप्तमी को कुमाऊं में सातूं के नाम से जाना जाता है। इस दिन महिलाएं गौरी-महेश्वर की प्रतिमाएं बनाकर उनकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं। इस बार पूजन का शुभ मुहूर्त सुबह 8:30 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक बताया गया है।
मान्यता के अनुसार सातूं का व्रत सकल सुख, सौभाग्य और संतान वृद्धि के लिए किया जाता है। माताएं सात गांठ वाले डोरक की प्रतिष्ठा कर उसे अपने हाथ में धारण करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि गौरी-महेश्वर का पूजन कर डोरक धारण करने से भगवान शिव और मां पार्वती की कृपा प्राप्त होती है।
अखंड सौभाग्य की कामना से होता है पूजन
पौराणिक मान्यताओं में मां गिरिजा को अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाली देवी माना गया है। मान्यता है कि माता सीता और द्वापर युग में माता रुक्मणी ने भी इच्छित मनोकामना की पूर्ति के लिए गिरिजा की स्तुति और पूजा की थी। इसी परंपरा के आधार पर आज भी महिलाएं सुख, सौभाग्य और संतान की मंगलकामना के लिए सातूं का व्रत करती हैं। विवाहित महिलाओं के साथ कुमारी कन्याएं भी अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए इस पर्व को श्रद्धा के साथ मनाती हैं।
डोरक धारण करने की विशेष परंपरा
सातूं पर्व में सात गांठ वाले डोरक को विशेष महत्व दिया जाता है। डोरक की प्रतिष्ठा और पूजन के बाद इसे हाथ में धारण किया जाता है। डोरक धारण करते समय धार्मिक मंत्र का उच्चारण करने की परंपरा है “देव देव जगन्नाथ सर्व सौभाग्य दायक। गृह्णामि डोर रूपं त्वां पुत्र पौत्र विवर्द्धनम्।। सप्तसामोपगीतं त्वां सप्त लोक महेश्वरम्। सूत्र ग्रन्थिस्थितं नित्यं धारयामि स्थिरोभव।।’’
फलाहार कर रखा जाता है व्रत
सातूं के व्रत में अग्नि में पकाया हुआ भोजन ग्रहण नहीं करने की परंपरा बताई गई है। इसलिए अधिकतर श्रद्धालु इस दिन फल आदि का सेवन कर व्रत रखते हैं। पर्व की धार्मिक मान्यताओं के साथ यह परंपरा कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
20 अगस्त को दूर्वाष्टमी यानी आठूं
सातूं के अगले दिन 20 अगस्त को दूर्वाष्टमी यानी आठूं का व्रत रखा जाएगा। इस दिन दूर्वा की प्रतिष्ठा कर उसे गले में धारण करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार दूर्वा अक्षय सौभाग्य और संतान सुख प्रदान करने वाली मानी जाती है।
आठूं के दिन गौरा-महेश्वर का विसर्जन भी किया जाता है। इस तरह सातूं से शुरू होकर आठूं तक चलने वाला यह पर्व कुमाऊं की महिलाओं की धार्मिक आस्था, पारिवारिक मंगलकामना और लोक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
