Uttarakhand: दाखिल-खारिज और प्रमाण-पत्रों में अब मौके पर सत्यापन जरूरी, मंडलायुक्त दीपक रावत ने जिलाधिकारियों को दिए सख्त निर्देश

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हल्द्वानी। दाखिल-खारिज और विभिन्न प्रकार के प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया में अब स्थलीय सत्यापन को महज औपचारिकता के तौर पर नहीं लिया जाएगा। कुमाऊं मंडल में राजस्व संबंधी कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मंडलायुक्त दीपक रावत ने सभी जिलाधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने कहा कि जिन मामलों में आवेदक की वास्तविक स्थिति, निवास, आय, परिवार या अन्य तथ्यों का मौके पर जाकर सत्यापन जरूरी है, उनमें संबंधित लेखपाल या पटवारी द्वारा अनिवार्य रूप से स्थलीय निरीक्षण किया जाए।

मंडलायुक्त ने कहा कि विभिन्न माध्यमों से ऐसी सूचनाएं सामने आई हैं कि कुछ मामलों में लेखपाल या पटवारी द्वारा दाखिल-खारिज तथा जाति, स्थायी निवास, आय और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) जैसे प्रमाण-पत्रों से संबंधित रिपोर्ट अपेक्षित स्थलीय सत्यापन के बिना ही प्रस्तुत कर दी जा रही है। ऐसी प्रक्रिया से न केवल गलत दाखिल-खारिज होने की आशंका रहती है, बल्कि भूमि संबंधी विवाद और अनियमितताओं को भी बढ़ावा मिल सकता है।

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उन्होंने कहा कि प्रमाण-पत्र जारी करने के मामलों में भी यदि आवेदक की वास्तविक स्थिति का उचित सत्यापन नहीं किया जाता है तो अपात्र लोगों को प्रमाण-पत्र जारी होने की संभावना बनी रहती है। साथ ही फर्जी प्रमाण-पत्र बनाए जाने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। मंडलायुक्त के अनुसार ऊधमसिंह नगर जिले में इस तरह के कुछ मामले संज्ञान में आए हैं, जिसके बाद पूरे कुमाऊं मंडल में सत्यापन व्यवस्था को और प्रभावी बनाने के निर्देश दिए गए हैं।

दीपक रावत ने जिलाधिकारियों से कहा कि दाखिल-खारिज के मामलों के साथ-साथ ऐसे सभी प्रमाण-पत्रों में मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति की जांच सुनिश्चित की जाए, जहां भौतिक सत्यापन आवश्यक है। संबंधित लेखपाल या पटवारी को केवल कागजी रिपोर्ट तैयार करने के बजाय वास्तविक स्थल पर पहुंचकर निरीक्षण करना होगा।

मंडलायुक्त ने स्थलीय सत्यापन की प्रक्रिया को डिजिटल रूप से भी प्रमाणिक और सत्यापन योग्य बनाने पर जोर दिया। उन्होंने निर्देश दिए कि फिलहाल संबंधित अधिकारी या कर्मचारी द्वारा मौके से फोटोग्राफ लिए जाएं और उन्हें संबंधित प्रकरण की पत्रावली अथवा ऑनलाइन आवेदन से जोड़ा जाए। फोटो में यथासंभव स्थल की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए। साथ ही फोटो लिए जाने की तारीख और समय की जानकारी भी उपलब्ध रहनी चाहिए, ताकि बाद में यह जांचा जा सके कि सत्यापन वास्तव में मौके पर किया गया था।

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उन्होंने भविष्य में इस प्रक्रिया को और तकनीकी रूप से मजबूत करने की दिशा में भी कार्यवाही करने को कहा। इसके तहत स्थलीय निरीक्षण के समय GPS, जियो-कोऑर्डिनेट्स या अन्य तकनीकी माध्यमों से निरीक्षण स्थल की वास्तविक स्थिति का सत्यापन किए जाने की व्यवस्था विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं। इससे राजस्व कर्मचारियों के मौके पर जाकर निरीक्षण करने की प्रक्रिया को तकनीकी प्रमाण के साथ जोड़ा जा सकेगा।

मंडलायुक्त ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देशित किया कि वे अपने-अपने जनपदों में संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को इस संबंध में स्पष्ट आदेश जारी करें। उन्होंने कहा कि जहां स्थलीय सत्यापन आवश्यक है, वहां बिना मौके पर जाकर जांच किए किसी भी स्थिति में रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की जानी चाहिए।

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उन्होंने व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राजस्व अधिकारियों के स्तर से नियमित पर्यवेक्षण और आकस्मिक जांच कराने के भी निर्देश दिए। यदि निरीक्षण या निगरानी के दौरान किसी कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है तो उसका उत्तरदायित्व निर्धारित करते हुए नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

मंडलायुक्त के इन निर्देशों का उद्देश्य दाखिल-खारिज और प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ ही फर्जीवाड़े और गलत रिपोर्टिंग की संभावनाओं पर अंकुश लगाना है। स्थलीय सत्यापन को डिजिटल प्रमाण से जोड़ने की व्यवस्था लागू होने से राजस्व संबंधी मामलों में जवाबदेही तय करने और शिकायतों की जांच को भी अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।

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