मुजफ्फरनगर। स्वामी कल्याण देव जिला चिकित्सालय एक बार फिर विवादों में घिर गया है। दिव्यांग किशोरी की मां ने अस्पताल के आर्थोपेडिक सर्जन पर ऑपरेशन के नाम पर रुपये लेने और उपचार के दौरान बेटी की हड्डी तोड़ने का गंभीर आरोप लगाया है। पीड़ित परिवार ने मामले की शिकायत जिलाधिकारी से कर निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग की है।
खांजापुर क्षेत्र निवासी रेशमा ने जिलाधिकारी उमेश मिश्रा को दिए शिकायती पत्र में बताया कि उनकी 13 वर्षीय दिव्यांग बेटी के पैर का ऑपरेशन जिला चिकित्सालय में कराया गया था। आरोप है कि ऑपरेशन के लिए आर्थोपेडिक चिकित्सक ने 25 हजार रुपये की मांग की थी, हालांकि बाद में आठ हजार रुपये लेकर ऑपरेशन किया गया।
महिला का कहना है कि ऑपरेशन के बाद भी बेटी के पैर की समस्या दूर नहीं हुई। जब वह दोबारा चिकित्सक के पास पहुंची तो उनसे 10 हजार रुपये और मांगे गए। आरोप है कि रुपये देने से इन्कार करने पर उपचार के दौरान चिकित्सक ने किशोरी का पैर जोर से मोड़ दिया, जिससे उसकी हड्डी टूट गई।
पीड़िता की मां ने आरोप लगाया कि उनकी बेटी को उपचार के नाम पर गंभीर शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ी और अब उसकी स्थिति पहले से अधिक खराब हो गई है। उन्होंने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
वहीं, जिला चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) डॉ. संजय वर्मा ने बताया कि शिकायत मिलने के बाद मामले की जांच कराई गई है। उनके अनुसार किशोरी के पैर का ऑपरेशन करीब दो माह पहले किया गया था और उपचार के दौरान बाहर से विशेष रॉड मंगाकर लगाई गई थी, जिसकी कीमत करीब आठ हजार रुपये थी।
सीएमएस का कहना है कि ऑपरेशन के बाद किशोरी को नियमित रूप से चलाया-फिराया नहीं गया, जिससे उसका घुटना जाम हो गया। जांच के दौरान जब घुटने को सामान्य स्थिति में लाने का प्रयास किया गया तो उसे दर्द हुआ और वह चीखने लगी।
उधर, आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. पी.के. चतुर्वेदी ने सभी आरोपों को निराधार बताया है। उनका कहना है कि किशोरी का ऑपरेशन पूरी तरह चिकित्सकीय मानकों के अनुरूप किया गया था। उन्होंने कहा कि परिजनों की लापरवाही के कारण समस्या उत्पन्न हुई और रुपये लेने के आरोप बेबुनियाद हैं। उन्होंने दावा किया कि अपना पक्ष संबंधित अधिकारियों के समक्ष रख चुके हैं।
मामले को लेकर अब जिला प्रशासन और अस्पताल प्रबंधन की जांच पर सभी की निगाहें टिकी हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सरकारी अस्पतालों में मरीजों से धन उगाही और उपचार व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।

