संघर्षविराम, होर्मुज खोलने और संयुक्त मिशन का तीन-सूत्रीय प्रस्ताव, ट्रंप-ईरान दोनों ने दिए बातचीत के संकेत
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के खतरे के बीच कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron ने अमेरिका और ईरान के बीच ठप पड़ी शांति वार्ता को फिर से पटरी पर लाने के लिए पहल शुरू की है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian से अलग-अलग बातचीत कर संवाद बहाल करने की कोशिश की है।
मैक्रों का लक्ष्य Islamabad में नाकाम रही वार्ता को दोबारा शुरू करना है। इसके लिए उन्होंने तीन-सूत्रीय प्रस्ताव रखा है, जिसमें पूरे क्षेत्र, खासकर लेबनान में पूर्ण संघर्षविराम, Strait of Hormuz को बिना किसी शर्त दोबारा खोलना और फ्रांस-ब्रिटेन की अगुवाई में समुद्री सुरक्षा के लिए ‘रक्षात्मक मिशन’ शुरू करना शामिल है।
फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने स्पष्ट कहा है कि क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ने से रोकने के लिए “इस्लामाबाद संवाद” को तुरंत पुनर्जीवित करना आवश्यक है। इसी कड़ी में मैक्रों और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री Keir Starmer शुक्रवार को Paris में एक अहम सम्मेलन की सह-अध्यक्षता करेंगे, जिसमें वे देश शामिल होंगे जो इस संकट से सीधे तौर पर प्रभावित नहीं हैं, लेकिन स्थिति को लेकर चिंतित हैं। अन्य देश वर्चुअल माध्यम से इसमें भाग लेंगे।
फ्रांस और ब्रिटेन पिछले कुछ हफ्तों से समुद्र में तेल टैंकरों और कंटेनर जहाजों की सुरक्षा के लिए एक संयुक्त मिशन की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। यूरोपीय देशों ने इस पूरी तरह रक्षात्मक पहल में सहयोग देने की इच्छा जताई है।
इसी बीच, राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान ने बातचीत का प्रस्ताव दिया है और वह जल्द समझौता करना चाहता है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी नौसेना की घेराबंदी ने ईरान पर दबाव बढ़ाया है, हालांकि उन्होंने दोहराया कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे।
दूसरी ओर, राष्ट्रपति पेजेशकियान ने संकेत दिए हैं कि तेहरान वार्ता के लिए तैयार है, लेकिन इसके लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन जरूरी होगा। ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि लेबनान में हिंसा थमे बिना किसी समझौते की संभावना नहीं है।
जमीनी स्तर पर हालात अब भी बेहद नाजुक बने हुए हैं। ईरान ने United Nations को पत्र लिखकर अमेरिकी घेराबंदी को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया है। साथ ही, Bahrain, Saudi Arabia, Qatar, United Arab Emirates और Jordan सहित पांच अरब देशों से मुआवजे की मांग भी की है।
इन सभी घटनाक्रमों के बीच अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या फ्रांस की यह पहल पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को कम कर पाएगी या हालात और गंभीर रूप ले सकते हैं।
