तेहरान। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर गहराता दिखाई दे रहा है। दक्षिणी ईरान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद तेहरान ने अमेरिका पर युद्धविराम समझौते को तोड़ने और बदनीयती दिखाने का आरोप लगाया है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी हमले को अनदेखा नहीं करेगा और उसका जवाब दिया जाएगा। इस बीच लंबे समय से बंद इंटरनेट सेवाओं को भी धीरे-धीरे बहाल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
जानकारी के अनुसार अमेरिकी सेना ने सोमवार को दक्षिणी ईरान के कुछ ठिकानों पर कार्रवाई की। अमेरिका का दावा है कि यह कदम रक्षात्मक रणनीति के तहत उठाया गया और इसमें मिसाइल लॉन्च साइट्स तथा बारूदी सुरंग बिछाने वाली नौकाओं को निशाना बनाया गया। वहीं ईरान ने इसे युद्धविराम का खुला उल्लंघन करार देते हुए कहा कि अमेरिका भरोसे के योग्य नहीं है और आगे के हालात के लिए वॉशिंगटन जिम्मेदार होगा।
ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने दावा किया है कि उसके हवाई क्षेत्र में प्रवेश करने वाले एक ड्रोन को मार गिराया गया, जबकि एक अन्य ड्रोन और लड़ाकू विमान को पीछे हटने पर मजबूर किया गया। इन घटनाओं के बाद खाड़ी क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
दोनों देशों के बीच कतर में युद्धविराम को आगे बढ़ाने और हालात सामान्य करने को लेकर बातचीत चल रही थी, लेकिन हालिया घटनाक्रम के बाद वार्ता पर भी अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर कालीबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची कतर से वापस लौट चुके हैं। दूसरी ओर अमेरिका की तरफ से कहा गया है कि युद्धविराम और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर किसी निष्कर्ष तक पहुंचने में अभी कुछ दिन लग सकते हैं।
उधर, सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कई महीनों से बंद इंटरनेट सेवाओं को ईरान अब धीरे-धीरे बहाल कर रहा है। कुछ क्षेत्रों में ब्रॉडबैंड सेवाएं शुरू कर दी गई हैं, हालांकि मोबाइल इंटरनेट अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाया है। इंटरनेट बंद होने से देश की अर्थव्यवस्था और व्यापारिक गतिविधियों पर गंभीर असर पड़ा है।
इस बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर वैश्विक चिंता भी बढ़ गई है। दुनिया के बड़े हिस्से में तेल और गैस की आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से होती है। ईरान द्वारा सीमित जहाजों को गुजरने की अनुमति देने और शुल्क वसूली की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों की चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ता रहा तो इसका असर केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

