हल्द्वानी: एसटीएच में जटिल ब्रेन ट्यूमर का सफल ऑपरेशन, 10 घंटे की सर्जरी से महिला को मिला जीवनदान

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हल्द्वानी। कभी न खत्म होने वाला सिरदर्द, आंख में सूजन और लगातार पानी आने की समस्या… पंतनगर की 34 वर्षीय किरन देवी के लिए यह रोजमर्रा की पीड़ा बन चुकी थी। दो साल तक झेलने के बाद जब उन्होंने हल्द्वानी के डॉ. सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय (एसटीएच) की न्यूरो सर्जरी ओपीडी में दस्तक दी, तब जाकर असली वजह सामने आई—खोपड़ी के आधार पर फैला हुआ करीब 7 सेंटीमीटर का ब्रेन ट्यूमर।

बीमारी और खतरा
डॉ. अभिषेक राज, न्यूरो सर्जन, बताते हैं कि मरीज को स्फेनॉइड विंग मेनिंगियोमा नामक बीमारी थी। यह ट्यूमर धीरे-धीरे बढ़ता है और आसपास की संरचनाओं—दृष्टि तंत्रिका, कैवर्नस साइनस और आंतरिक कैरोटिड धमनी—पर दबाव डालता है। परिणामस्वरूप रोगियों में लगातार सिरदर्द, आंखों की रोशनी कम होना और दोहरा दिखाई देने जैसे लक्षण उभरते हैं।

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ऑपरेशन की चुनौती
करीब 10 घंटे लंबे इस ऑपरेशन में अत्याधुनिक माइक्रोस्कोप की मदद से ट्यूमर को सुरक्षित रूप से निकाला गया। डॉ. राज बताते हैं कि इस तरह की सर्जरी अत्यंत जटिल होती है क्योंकि इसमें ऑप्टिक नर्व और महत्वपूर्ण रक्त वाहिकाओं को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होती है। “सौभाग्य से ऑपरेशन सफल रहा और मरीज की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है,” वे कहते हैं।

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खर्च और राहत
निजी अस्पतालों में इस तरह की सर्जरी का खर्च चार से पांच लाख रुपये तक आता है। लेकिन किरन देवी का यह उपचार आयुष्मान भारत योजना के तहत बिल्कुल मुफ्त हुआ। इससे मरीज और परिजन के चेहरे पर राहत की मुस्कान लौट आई।

टीमवर्क और उपलब्धि
इस सर्जरी में एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. ए.के. सिन्हा और नर्सिंग स्टाफ का अहम योगदान रहा। सफल ऑपरेशन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए प्रभारी प्राचार्य डॉ. पंकज सिंह ने कहा, “यह अस्पताल और हमारे लिए गर्व की बात है कि यहां वरिष्ठ चिकित्सक लगातार जटिल ऑपरेशन सफलतापूर्वक कर रहे हैं। आयुष्मान कार्डधारक मरीजों को मुफ्त इलाज, ऑपरेशन और दवाइयां उपलब्ध कराना सरकार की बड़ी पहल है, जिसका लाभ मरीजों को मिल रहा है।”

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उम्मीद की किरण
किरन देवी अब स्वस्थ्य हो रही हैं और जल्द ही उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी। यह उपलब्धि न सिर्फ चिकित्सालय की क्षमता को रेखांकित करती है, बल्कि उत्तराखंड के उन हजारों रोगियों के लिए भी आशा की किरण है, जो बड़े खर्च के डर से अक्सर इलाज कराने से पीछे हट जाते हैं।

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