नई दिल्ली। पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर पाबंदियों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार को आगाह किया है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता की आवाज दबाने के बजाय उसे सुनना जरूरी है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन सरकार के लिए फीडबैक का काम करते हैं और नीतियों में सुधार का अवसर देते हैं। यदि जनता की नाराजगी को लगातार नजरअंदाज किया गया, तो भारत में भी नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।
मुंबई में आयोजित आईपीएफ फेस्टिवल में बोलते हुए वांगचुक ने कहा कि जनता की शिकायतों को अनसुना करना किसी भी सरकार के लिए नुकसानदेह हो सकता है। लोगों को अपनी समस्याएं रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलने पर असंतोष बढ़ सकता है, जिसका असर शासन व्यवस्था पर पड़ सकता है।
‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन सरकार के लिए फीडबैक’
वांगचुक ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन केवल नाराजगी जताने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनके जरिए सरकार को अपनी नीतियों और कामकाज की जमीनी स्थिति का पता चलता है। जनता किन समस्याओं से जूझ रही है और सरकारी नीतियों का उस पर क्या असर पड़ रहा है, यह समझने में प्रदर्शन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार को विरोध की आवाज को दबाने के बजाय उसके पीछे की वजहों को समझना चाहिए। समय रहते शिकायतों का समाधान होने से असंतोष को बढ़ने से रोका जा सकता है और शासन व्यवस्था में लोगों का भरोसा बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
ब्रिटेन और नॉर्वे का उदाहरण देकर उठाए सवाल
वांगचुक ने ब्रिटेन, नॉर्वे और स्वीडन जैसे देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति दी जाती है। उनके मुताबिक, इससे जनता को अपनी मांगें सीधे सरकार के सामने रखने का अवसर मिलता है और नीति-निर्माताओं पर समस्याओं के समाधान के लिए ध्यान देने का दबाव बनता है।
उन्होंने दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थानों की दूरी पर भी सवाल उठाए। वांगचुक ने कहा कि संसद से जंतर-मंतर की दूरी ही काफी है, जबकि रामलीला मैदान और बुराड़ी मैदान जैसे स्थानों की दूरी प्रदर्शनकारियों की आवाज को संबंधित अधिकारियों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने में बाधा बन सकती है।
उनका तर्क था कि विरोध स्थलों को सरकार के प्रमुख कार्यालयों से दूर रखने के बजाय ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे जनता अपनी बात प्रभावी तरीके से रख सके।
प्रदर्शन की अनुमति की अनिवार्यता पर पुनर्विचार की मांग
वांगचुक ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए अनुमति लेने की अनिवार्यता पर भी पुनर्विचार करने की बात कही। उन्होंने कहा कि सरकार और पुलिस को कार्यक्रमों की जानकारी होनी चाहिए, ताकि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी इंतजाम किए जा सकें।
उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध को नागरिकों का संवैधानिक अधिकार बताते हुए कहा कि इस अधिकार को सीमित करने से लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। उनके अनुसार, विरोध प्रदर्शनों को केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती मानने के बजाय जनता की समस्याओं को समझने के अवसर के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
चीन-पाकिस्तान सीमा का जिक्र, सुरक्षाबलों की तैनाती पर सवाल
वांगचुक ने विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सुरक्षाबलों की जिम्मेदारियों में आंतरिक सुरक्षा के साथ देश की सीमाओं की रक्षा भी शामिल है। सर्दियों के दौरान चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर सुरक्षा की जरूरत का उल्लेख करते हुए उन्होंने सुरक्षाबलों की तैनाती और प्राथमिकताओं पर ध्यान देने की बात कही।
सरकार के लिए संदेश: जनता की नाराजगी को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी
वांगचुक ने नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका का उदाहरण देते हुए चेताया कि जब लोगों की समस्याओं और नाराजगी को लगातार नजरअंदाज किया जाता है, तो असंतोष गंभीर रूप ले सकता है। उन्होंने सरकार से जनता की शिकायतों को समय रहते सुनने और उनका समाधान करने का आग्रह किया।
उनके बयान का मुख्य संदेश यही रहा कि शांतिपूर्ण विरोध को दबाने के बजाय उससे मिलने वाले संकेतों को समझना चाहिए। लोकतंत्र में जनता की भागीदारी और असहमति के लिए जगह बनाए रखना शासन व्यवस्था को जवाबदेह बनाने में मदद करता है।
वांगचुक की इस टिप्पणी ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन, नागरिक अधिकारों और सरकार की जवाबदेही को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है।

