करक चतुर्थी व्रत में पति-पत्नी के प्रेम, विश्वास और अखंड सौभाग्य का महत्व; शाम 5:50 बजे से रात 10:11 बजे तक पूजा का समय बताया गया
हल्द्वानी। सुहाग, प्रेम और दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि का प्रतीक करवा चौथ व्रत इस बार 29 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जाएगा। करक चतुर्थी के नाम से प्रसिद्ध इस व्रत को लेकर महिलाओं में उत्साह है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस बार करवा चौथ पर बुधादित्य योग के साथ शुक्रास्त का संयोग भी रहेगा। धार्मिक मान्यताओं में कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सौभाग्य प्रदान करने वाला माना गया है।
जानें चतुर्थी तिथि और पूजा का समय

ज्योतिषाचार्य डॉ. नवीन चंद्र जोशी द्वारा बताई गई पंचांग गणना के अनुसार चतुर्थी तिथि का आरंभ 28 अक्टूबर की रात 1 बजकर 8 मिनट से होगा और इसका समापन 29 अक्टूबर की रात 10 बजकर 11 मिनट पर होगा। इस आधार पर 29 अक्टूबर को सूर्योदय से चंद्रोदय तक व्रत और पूजन से जुड़ी धार्मिक परंपराओं का पालन किया जाएगा।
करवा चौथ के प्रमुख समय
- व्रत की तिथि: 29 अक्टूबर, गुरुवार
- पूजन का शुभ मुहूर्त: शाम 5:50 बजे से रात 10:11 बजे तक
- बताया गया चंद्रोदय समय: शाम 8:12 बजे
चंद्रोदय का वास्तविक समय स्थान के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए व्रत रखने वाली महिलाओं को अपने शहर के स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि करनी चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को बताया था व्रत का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार करक चतुर्थी व्रत की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को इस व्रत का महत्व बताया था। इस अवसर पर भगवती करक देवी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। धार्मिक आस्था के अनुसार देवी की आराधना से अखंड सौभाग्य और संतान सुख की कामना की जाती है।
शास्त्रीय परंपराओं में इस व्रत के दौरान बाहरी आचरण के साथ आंतरिक शुद्धता पर भी जोर दिया गया है। सत्य, शौच और दया जैसे गुणों का पालन करते हुए व्रत करने की प्रेरणा दी जाती है।
सूर्योदय से पहले स्नान, शाम को पूजा और चंद्र दर्शन के बाद व्रत पारण
परंपरागत विधि के अनुसार महिलाएं अरुणोदय वेला से पहले स्नान कर दैनिक पूजा-अर्चना करती हैं। सूर्योदय के बाद निर्जला व्रत रखा जाता है। शाम के समय संध्या पूजन के साथ भगवती करक देवी की आराधना की जाती है। इसके बाद चंद्रमा के दर्शन कर उनका पूजन किया जाता है और परंपरा के अनुसार पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत खोला जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए इस व्रत से दांपत्य जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि की कामना की जाती है।
उपहार और दिखावे से आगे बढ़कर समझें व्रत का वास्तविक अर्थ
समय के साथ करवा चौथ मनाने के तरीकों में बदलाव आया है। कई बार उपहारों और बाहरी दिखावे को अधिक महत्व मिलने लगता है, जबकि इस व्रत का पारंपरिक संदेश पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास, समर्पण और आपसी सम्मान को मजबूत करना है।
करवा चौथ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि दांपत्य संबंधों की आत्मीयता और एक-दूसरे के प्रति समर्पण का प्रतीक भी है। इसकी मूल भावना यह है कि पति-पत्नी भले ही दो अलग-अलग शरीर हों, लेकिन प्रेम और विश्वास के माध्यम से उनके हृदय एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
इस प्रकार करवा चौथ का पर्व धार्मिक आस्था के साथ वैवाहिक जीवन में सुख, सौहार्द और पारस्परिक समझ को महत्व देने का संदेश देता है।

