यरुशलम। अमेरिका और ईरान के बीच क्षेत्रीय तनाव कम करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने को लेकर हुए प्रारंभिक शांति समझौते पर इस्राइल ने पहली बार खुलकर आपत्ति जताई है। इस्राइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता में हुआ यह समझौता इस्राइल पर किसी भी रूप में लागू नहीं होता और देश अपनी सुरक्षा संबंधी नीतियां स्वतंत्र रूप से तय करेगा।
बेन-गवीर ने सोशल मीडिया पर जारी बयान में कहा, “ट्रंप का समझौता हमें बाध्य नहीं करता। इस्राइल अमेरिका के अधीन नहीं है, बल्कि एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है।” उन्होंने कहा कि इस्राइल अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रंप का सम्मान करता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में अंतिम निर्णय केवल इस्राइल ही करेगा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह समझौता इस्राइल की सुरक्षा की पर्याप्त गारंटी नहीं देता। बेन-गवीर ने कहा कि इस्राइल किसी भी ऐसी व्यवस्था को स्वीकार नहीं करेगा जो लेबनान में उसकी सैन्य कार्रवाई की स्वतंत्रता को सीमित करे। उनके अनुसार, ईरान समर्थित संगठन हिजबुल्लाह का पूर्ण निरस्त्रीकरण और प्रभाव खत्म होना इस्राइल की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री ने कहा कि इस्राइली सेना द्वारा आतंकवादी ढांचे से मुक्त कराए गए क्षेत्रों से पीछे हटने का कोई प्रश्न नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि उत्तरी सीमा पर हिजबुल्लाह की दोबारा सक्रियता किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी और लेबनान से होने वाले किसी भी ड्रोन, यूएवी या मिसाइल हमले का जवाब कड़ी सैन्य कार्रवाई से दिया जाएगा।
उधर, अमेरिका और ईरान के बीच हुए प्रारंभिक समझौते में युद्धविराम, होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने तथा व्यापक वार्ता के लिए 60 दिनों की बातचीत अवधि का प्रावधान बताया गया है। हालांकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अभी अंतिम सहमति बनना बाकी है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस्राइल की इस कड़ी प्रतिक्रिया से पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की राह आसान नहीं होगी। विशेषकर लेबनान और हिजबुल्लाह से जुड़े मुद्दों पर इस्राइल की स्वतंत्र सैन्य नीति क्षेत्रीय तनाव को आगे भी प्रभावित कर सकती है।

