नई दिल्ली/श्रीहरिकोटा। भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि अपने नाम कर ली है। देश का पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट ‘विक्रम-1’ शनिवार को आंध्र प्रदेश के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। लॉन्च के बाद रॉकेट ने निर्धारित 450 किलोमीटर ऊंची लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में सफलतापूर्वक प्रवेश करते हुए अपने पेलोड स्थापित कर दिए।
इस सफलता के साथ भारत निजी क्षेत्र में ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता हासिल करने वाला दुनिया का तीसरा देश बन गया है। यह उपलब्धि भारतीय निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए मील का पत्थर मानी जा रही है।
स्काईरूट एयरोस्पेस ने रचा इतिहास
हैदराबाद स्थित स्पेस स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित ‘विक्रम-1’ की यह पहली परीक्षण उड़ान (Test Flight-1) थी। कंपनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इसकी सफलता की जानकारी साझा करते हुए लिखा कि रॉकेट ने अपना अंतिम बर्न सफलतापूर्वक पूरा किया और सभी पेलोड को पृथ्वी से करीब 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर निर्धारित कक्षा में स्थापित कर दिया।
कंपनी ने इसे भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए “ऐतिहासिक क्षण” बताते हुए कहा कि अब भारत निजी ऑर्बिटल लॉन्च तकनीक वाले चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है।
उड़ान के हर चरण ने किया सफल प्रदर्शन
लॉन्च के कुछ ही सेकंड बाद विक्रम-1 ने लॉन्च टॉवर से सुरक्षित दूरी बना ली। इसके बाद मिशन के सभी महत्वपूर्ण चरण क्रमवार सफल रहे।
- पहला चरण कलाम-1200 ने रॉकेट को घने वायुमंडल से बाहर पहुंचाया।
- इसके बाद पेलोड फेयरिंग सफलतापूर्वक अलग हुई, जिससे उपग्रह पहली बार अंतरिक्ष के खुले वातावरण में पहुंचे।
- दूसरा चरण कलाम-250 ने निर्धारित ईंधन दहन पूरा कर रॉकेट को आगे बढ़ाया।
- अंत में तीसरा चरण कलाम-100 सक्रिय हुआ और रॉकेट को अंतिम गति देते हुए निर्धारित कक्षा तक पहुंचाया।
मिशन के अंतिम चरण में लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल ने पेलोड्स को सटीक ऑर्बिट में स्थापित किया।
अत्याधुनिक तकनीक से तैयार हुआ विक्रम-1
विक्रम-1 पूरी तरह आधुनिक तकनीक से तैयार किया गया है। इसमें कार्बन कम्पोजिट स्ट्रक्चर, तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज, 3डी-प्रिंटेड लिक्विड इंजन और उन्नत ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल का उपयोग किया गया है।
यह रॉकेट 350 किलोग्राम तक के पेलोड को 450 किलोमीटर ऊंची लो अर्थ ऑर्बिट में स्थापित करने में सक्षम है। भविष्य में इसका उपयोग छोटे और मध्यम आकार के उपग्रहों के व्यावसायिक प्रक्षेपण के लिए किया जाएगा।
कई देशों के पेलोड लेकर पहुंचा अंतरिक्ष
अपने पहले मिशन में विक्रम-1 कई महत्वपूर्ण पेलोड लेकर अंतरिक्ष पहुंचा। इनमें स्काईरूट का स्कोप सैटेलाइट, डीक्यूब्ड का टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन पेलोड, ग्रह स्पेस का सोलर्स एस-3 उपग्रह और कॉस्मोसर्व स्पेस का ‘इमब्रेस’ रोबोटिक आर्म शामिल है। यह रोबोटिक आर्म भविष्य में अंतरिक्ष में मौजूद मलबे (Space Debris) को पकड़ने और हटाने की तकनीक का परीक्षण करेगा।
इसके अलावा मिशन में कुछ विशेष स्मारक पेलोड भी भेजे गए। इनमें “कॉस्मिक ब्लूम” नाम की फूलों के आकार की कलाकृति और 18 कैरेट सोने का एक माइक्रो रॉकेट शामिल है, जिस पर भारत के महान वैज्ञानिक सी.वी. रमन, डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की सूक्ष्म आकृतियां उकेरी गई हैं।
भारत के निजी स्पेस सेक्टर के लिए नई उड़ान
विशेषज्ञों का मानना है कि विक्रम-1 की सफलता भारतीय निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए गेम चेंजर साबित होगी। इससे देश की निजी कंपनियों को वैश्विक सैटेलाइट लॉन्च बाजार में नई पहचान मिलेगी और भारत कम लागत वाले वाणिज्यिक प्रक्षेपणों का बड़ा केंद्र बनकर उभरेगा।
विक्रम-1 की यह ऐतिहासिक उड़ान केवल एक रॉकेट की सफलता नहीं, बल्कि भारत के आत्मनिर्भर अंतरिक्ष अभियान और निजी स्पेस इकोसिस्टम की नई शुरुआत का प्रतीक भी बन गई है।

