हल्द्वानी (नैनीताल)। आर्य समाज हल्द्वानी में आयोजित ‘वैदिक साप्ताहिक सत्संग’ के अंतर्गत ‘छठा विश्व यज्ञ दिवस’ श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित विशेष कार्यक्रम में प्रख्यात वैदिक विद्वान डॉ. विनय विद्यालंकार ने अपने गहन और प्रेरणादायक विचारों से उपस्थित जनसमूह को अभिभूत किया।
डॉ. विद्यालंकार ने अपने व्याख्यान में यज्ञ की पारंपरिक धारणा को विस्तार देते हुए कहा कि यज्ञ केवल अग्निहोत्र या हवन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक जीवनशैली और ब्रह्मांडीय प्रक्रिया है, जो सृष्टि के संचालन का आधार है। उन्होंने वेदों, विशेष रूप से पुरुष सूक्त का संदर्भ देते हुए यज्ञ के पांच प्रमुख स्वरूपों को विस्तार से समझाया—
परमात्मा रूपी यज्ञ:
उन्होंने कहा कि सृष्टि की रचना स्वयं परमात्मा के यज्ञ स्वरूप से हुई है, जिसने मानव कल्याण के लिए ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का ज्ञान प्रदान किया।
सृष्टि रूपी यज्ञ:
उन्होंने बताया कि प्रकृति का हर तत्व—सूर्य, वायु, जल—निरंतर दूसरों के लिए कार्य करता है, जो एक सतत यज्ञ का प्रतीक है।
मानव शरीर रूपी यज्ञ:
मानव शरीर को ‘यज्ञशाला’ बताते हुए उन्होंने कहा कि शुद्ध आहार, विचार और आचरण से यह शरीर ‘अयोध्या’ बनता है, अन्यथा विकार इसे ‘लंका’ बना देते हैं।
संगठन रूपी यज्ञ:
समाज और राष्ट्र की एकता को यज्ञ बताते हुए उन्होंने इसे भगवान विष्णु के प्रतीकों—शंख, चक्र, गदा और कमल—से जोड़कर समझाया।
परोपकार रूपी यज्ञ:
उन्होंने कहा कि अपने ज्ञान, धन और शक्ति का उपयोग दूसरों के कल्याण में करना ही सच्चा यज्ञ है। अपने संबोधन में उन्होंने यज्ञ की सरल परिभाषा देते हुए कहा, “कर्म करते जाना और फल बांटकर खाना ही सच्चा यज्ञ है।”
कार्यक्रम के अंत में सभी श्रद्धालुओं से अपने जीवन को यज्ञमय बनाने और वैदिक ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया गया। इस आयोजन ने न केवल आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा दिया, बल्कि सामाजिक समरसता और परोपकार की भावना को भी सुदृढ़ किया।

