वॉशिंगटन/पश्चिम एशिया: पश्चिम एशिया में हालात तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं और अब संभावित बड़े सैन्य टकराव की आशंका गहराने लगी है। अमेरिका की सेना ने क्षेत्र में अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं, जिससे यह संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले समय में हालात और गंभीर हो सकते हैं।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें साझा कर जानकारी दी है कि अमेरिकी नौसेना के जहाजों के जरिए बड़े पैमाने पर ईंधन, खाद्य सामग्री, हथियार और अन्य सैन्य साजो-सामान पश्चिम एशिया भेजा जा रहा है। तस्वीरों में गाइडेड-मिसाइल डेस्ट्रॉयर यूएसएस डेलबर्ट डी ब्लैक पर भारी मात्रा में सैन्य आपूर्ति लोड होती दिखाई गई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीते 24 घंटों में अमेरिका ने इजराइल को 6,000 टन से अधिक गोला-बारूद और हथियार भेजे हैं। इजराइली मीडिया का दावा है कि दो कार्गो जहाजों और कई विमानों के जरिए करीब 6,500 टन सैन्य सामग्री, जिसमें मिलिट्री ट्रक और आधुनिक हथियार शामिल हैं, इजराइल पहुंचाए गए हैं। बताया जा रहा है कि ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद से अब तक अमेरिका इजराइल को 1,15,600 टन से अधिक सैन्य सामग्री भेज चुका है।
इस बीच डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुई एक अहम बैठक में सेंटकॉम कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य विकल्पों की जानकारी दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में हुई इस बैठक में सीमित लेकिन अत्यधिक प्रभावी हमले के विकल्प पर चर्चा की गई, जिसमें ईरान के सैन्य ठिकानों, नेतृत्व और रणनीतिक ढांचे को निशाना बनाया जा सकता है।
अमेरिकी सेना इस बार और ज्यादा मारक क्षमता वाले हथियारों के इस्तेमाल पर विचार कर रही है। इनमें हाई-टेक हाइपरसोनिक मिसाइलें भी शामिल हैं, जो लक्ष्य को बेहद तेजी और सटीकता से भेदने में सक्षम मानी जाती हैं।
दूसरी ओर, रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया जा रहा है कि ईरान संघर्षविराम के दौरान अपनी सैन्य क्षमता को फिर से मजबूत करने में जुटा है। अमेरिकी मीडिया के अनुसार, ईरान उन मिसाइलों और हथियारों को फिर से निकालने की कोशिश कर रहा है, जो हालिया हमलों के बाद जमीन के नीचे या मलबे में दब गए थे।
इसी बीच तेहरान में एयर डिफेंस सिस्टम के सक्रिय होने की खबरें सामने आई हैं। ईरानी मीडिया के अनुसार, इन सिस्टम्स को छोटे ड्रोन और संभावित खतरों को रोकने के लिए सक्रिय किया गया, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह अभ्यास था या वास्तविक खतरे के मद्देनजर उठाया गया कदम।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात इसी तरह बिगड़ते रहे, तो पश्चिम एशिया एक बार फिर बड़े युद्ध की ओर बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक राजनीति, तेल बाजार और अर्थव्यवस्था पर व्यापक रूप से पड़ेगा।

