तेहरान/वॉशिंगटन। अमेरिका में मिडटर्म चुनाव से ठीक पहले ईरान में हुए सिलसिलेवार धमाकों ने मध्य पूर्व में तनाव बढ़ा दिया है। सोमवार को ईरान के रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण केश्म द्वीप पर कम से कम पांच जोरदार विस्फोट हुए। इसके अलावा बंदर लेंगेह शहर में भी धमाकों की खबर सामने आई है। इन घटनाओं के बाद अमेरिका और ईरान के बीच पहले से जारी तनाव के और गहराने की आशंका जताई जा रही है।
अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अधिकारियों के हवाले से दावा किया है कि इन धमाकों के पीछे अमेरिका का हाथ हो सकता है। हालांकि, अभी तक ईरानी मीडिया ने इन घटनाओं में अमेरिका या इजराइल की भूमिका की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। ऐसे में धमाकों की असली वजह को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
इस बीच ईरानी मीडिया ने दावा किया है कि देश की सेना ने अमेरिका के दो MQM-170 जासूसी ड्रोन मार गिराए हैं। हालांकि, इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लगातार सामने आ रही इन खबरों ने क्षेत्र में संभावित सैन्य टकराव की आशंका बढ़ा दी है।
अमेरिका के लिए क्यों अहम है केश्म द्वीप?
ईरान का सबसे बड़ा द्वीप केश्म करीब 1,445 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। कभी पर्यटन और मुक्त व्यापार क्षेत्र के रूप में पहचान रखने वाला यह द्वीप अब अपनी सामरिक स्थिति के कारण अंतरराष्ट्रीय रणनीति का अहम केंद्र बन चुका है।
होर्मुज स्ट्रेट के प्रवेश द्वार के नजदीक स्थित होने के कारण केश्म द्वीप ईरान की समुद्री सुरक्षा और सैन्य रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यहां से फारस की खाड़ी में जहाजों की आवाजाही पर नजर रखना संभव है। यही वजह है कि किसी भी सैन्य गतिविधि के लिहाज से यह इलाका बेहद संवेदनशील माना जाता है।
भूमिगत सुरंगों में मिसाइलों और सैन्य उपकरणों का ठिकाना
रिपोर्टों के मुताबिक, केश्म द्वीप के नीचे भूमिगत सुरंगों और प्राकृतिक नमक की गुफाओं का विस्तृत नेटवर्क मौजूद है। माना जाता है कि ईरान ने इन ठिकानों का इस्तेमाल तटीय मिसाइल प्रणालियों और तेज गति वाली सैन्य नौकाओं को सुरक्षित रखने के लिए किया है।
इन भूमिगत सैन्य ठिकानों की मौजूदगी ईरान को समुद्री क्षेत्र में अपनी सैन्य क्षमता बनाए रखने में मदद करती है। हालांकि, इन ठिकानों की वास्तविक संख्या और वहां मौजूद हथियारों की पूरी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
होर्मुज स्ट्रेट पर नजर रखने की रणनीतिक ताकत
केश्म द्वीप की अहमियत का सबसे बड़ा कारण इसकी भौगोलिक स्थिति है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट के करीब स्थित है। इस रास्ते से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि या जहाजों की आवाजाही में बाधा आने से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार प्रभावित हो सकता है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता है और इस समुद्री मार्ग पर संकट पैदा होता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आने की आशंका भी रहेगी।
ट्रंप ने ईरान के साथ समझौते के दिए संकेत
ईरान में धमाकों की खबरों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिलहाल तेहरान पर दोबारा सैन्य हमला करने की योजना से इनकार किया है। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के जरिए समझौते का रास्ता निकल सकता है।
जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर सैन्य कार्रवाई की जा सकती है, तो उन्होंने इस संभावना से इनकार किया। उनके इस बयान को दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की संभावित कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
ट्रंप के तेल कीमतों को लेकर बड़े दावे
ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि ईरान के साथ बड़े युद्ध की आशंका कम होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 10 डॉलर प्रति बैरल की गिरावट आई है।
उनके मुताबिक, 31 अक्टूबर को कच्चे तेल की कीमत 118 डॉलर प्रति बैरल थी, जो 1 नवंबर को घटकर 108 डॉलर प्रति बैरल रह गई। हालांकि, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के पीछे कई वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक कारक भी जिम्मेदार होते हैं।
धमाकों से बढ़ी दुनिया की चिंता, तेल बाजार पर रहेगी नजर
फिलहाल केश्म द्वीप और बंदर लेंगेह में हुए धमाकों की वजह को लेकर आधिकारिक तस्वीर साफ नहीं है। अमेरिका या इजराइल की कथित भूमिका की पुष्टि भी नहीं हुई है। ऐसे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
हालांकि, केश्म द्वीप की रणनीतिक अहमियत और होर्मुज स्ट्रेट से इसकी निकटता को देखते हुए इन घटनाओं पर पूरी दुनिया की नजर है। यदि यह मामला किसी बड़े सैन्य टकराव में बदलता है, तो इसका असर केवल अमेरिका और ईरान के संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

