हल्द्वानी। पंडित डॉ. नवीन चंद्र जोशी के अनुसार इस वर्ष नाग पंचमी पर्व 17 अगस्त 2026, सोमवार को मनाया जाएगा। सोमवार के दिन नाग पंचमी पड़ने से पूजा-अर्चना और अनुष्ठान के लिए विशेष शुभ योग बन रहा है। उन्होंने बताया कि इसी दिन भगवान सूर्य सिंह राशि में प्रवेश करेंगे और इसी के साथ भाद्रपद संक्रांति यानी घी संक्रांति का पर्व भी मनाया जाएगा।

नाग पंचमी को श्रावण मास में भगवान शिव की उपासना के लिए विशेष महत्व वाला पर्व माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से नाग देवताओं की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नागों की पूजा भगवान शिव की आराधना से जुड़ी हुई है। पंडित डॉ. जोशी के मुताबिक, ज्योतिषीय दृष्टि से जिन जातकों की कुंडली में कालसर्प योग अथवा राहु-केतु संबंधी दोष बताए जाते हैं, वे नाग पंचमी पर भगवान शिव को नागों का जोड़ा अर्पित कर पूजा-अर्चना और रुद्राभिषेक कर सकते हैं।
उन्होंने बताया कि श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के अनुसार महर्षि कश्यप की दो पत्नियां कद्रू और विनीता थीं। कद्रू से कर्कोटक, तक्षक, वासुकी आदि नागों की उत्पत्ति हुई, जबकि विनीता ने गरुड़ को जन्म दिया, जो भगवान नारायण के वाहन बने और पक्षीराज कहलाए।
धार्मिक कथा के अनुसार राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ के दौरान बड़ी संख्या में सर्प अग्नि में जलने लगे थे। इसी समय देवताओं की प्रेरणा से आस्तीक मुनि ने सर्प यज्ञ को रुकवाकर नागों और सर्पों की रक्षा की। मान्यता है कि वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, शंखपाल, कालिय, अनंत, कुलिक और पद्मनाग आदि ने भगवान की आराधना कर अमरत्व प्राप्त किया।
पंडित डॉ. जोशी के अनुसार धार्मिक मान्यताओं में नागों को भगवान आशुतोष शिव का उपासक माना गया है। इसी कारण नाग पंचमी पर नाग देवताओं और भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। कुमाऊं अंचल में भी प्राचीन समय से नाग देवताओं की विधि-विधान से पूजा की परंपरा चली आ रही है।
कुमाऊं के नाग मंदिरों में विशेष पूजा
नाग पंचमी के अवसर पर कुमाऊं के विभिन्न नाग मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। पिंगली नाग, कालिय नाग, धौलीनाग, बेरीनाग, फेणीनाग और वासुकी नाग आदि मंदिरों में श्रद्धालु पूजा के लिए पहुंचते हैं। नाग मंदिरों में पंचामृत अभिषेक का भी विशेष महत्व बताया गया है। पंचामृत में दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अभिषेक किया जाता है।
पंडित डॉ. नवीन चंद्र जोशी के अनुसार नाग पंचमी के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त प्रातः 7:15 बजे से शाम 3:55 बजे तक रहेगा। इस दौरान नाग देवता और भगवान शिव की पूजा-अर्चना करना विशेष फलदायी माना गया है।
नाग पंचमी के साथ विरूढ़ पंचमी और घी संक्रांति भी
17 अगस्त को ही विरूढ़ पंचमी भी होगी। इस दिन पारंपरिक रूप से विरूढ़ भिगोए जाने की परंपरा है। साथ ही सूर्य के सिंह राशि में प्रवेश करने के कारण इसी दिन घी संक्रांति का पर्व भी मनाया जाएगा।
पंडित डॉ. जोशी के अनुसार सूर्य के सिंह राशि में प्रवेश से विशेष ऊर्जा प्राप्त होने की धार्मिक-ज्योतिषीय मान्यता है। घी संक्रांति के अवसर पर घी का सेवन करने की भी परंपरा है। मान्यता के अनुसार इस दिन घी का सेवन करने से रोग-शोक दूर होते हैं और शरीर को सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
