हल्द्वानी। कुमाऊं के सबसे बड़े छात्र संख्या वाले एमबीपीजी महाविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव का परिणाम इस बार बेहद चौंकाने वाला रहा। जिस संगठन का दबदबा पिछले कई वर्षों से अध्यक्ष पद पर बना हुआ था, उसी संगठन के पुराने कार्यकर्ता ने अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़कर पूरा समीकरण बदल दिया। एबीवीपी से बगावत कर निर्दलीय मैदान में उतरे आर्यन बेलवाल ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज कर दी। उन्होंने एनएसयूआई के मेहुल साह को पीछे छोड़ते हुए अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा जमाया, जबकि एबीवीपी के अधिकृत प्रत्याशी धीरज बिष्ट तीसरे स्थान पर रहे।
इस परिणाम ने एमबीपीजी की छात्र राजनीति में संगठन बनाम प्रत्याशी की बहस को भी जन्म दे दिया है। चुनाव से पहले एबीवीपी प्रत्याशी के पक्ष में संगठनात्मक ताकत और कई प्रभावशाली नेताओं के समर्थन को महत्वपूर्ण माना जा रहा था, लेकिन मतदान के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। एबीवीपी का एक बड़ा वोट बैंक अधिकृत प्रत्याशी के बजाय उसके ही बागी प्रत्याशी आर्यन बेलवाल के साथ चला गया।
टिकट नहीं मिला तो मैदान में उतर गए आर्यन
आर्यन बेलवाल लंबे समय से एबीवीपी से जुड़े रहे हैं और संगठन के पुराने कार्यकर्ता माने जाते हैं। इस बार उन्होंने एबीवीपी के बैनर तले ही अध्यक्ष पद के लिए चुनावी तैयारी शुरू कर दी थी। उन्हें उम्मीद थी कि संगठन उनकी सक्रियता और छात्र राजनीति में किए गए काम को देखते हुए अध्यक्ष पद का टिकट देगा। लेकिन अंतिम समय में एबीवीपी ने धीरज बिष्ट को प्रत्याशी घोषित कर दिया।
टिकट कटने के बाद आर्यन ने संगठन के फैसले को चुनौती देते हुए निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। इसके साथ ही एमबीपीजी का चुनाव अचानक दिलचस्प हो गया। आर्यन ने अपने प्रचार अभियान में ‘बागी हैं, पर दागी नहीं’ का नारा दिया। यह नारा छात्रों के बीच खूब चर्चा में रहा और उनके चुनाव अभियान की पहचान बन गया।
संगठन के वोट बैंक में लगी सेंध
एबीवीपी की बगावत का सबसे बड़ा असर उसके अपने वोट बैंक पर पड़ा। संगठन से लंबे समय से जुड़े आर्यन की कॉलेज में व्यक्तिगत पहचान और छात्र-छात्राओं से संपर्क पहले से था। टिकट नहीं मिलने के बाद एबीवीपी से जुड़े छात्रों का एक बड़ा धड़ा उनके साथ आ गया। यही वोट अंततः आर्यन की जीत का आधार बना।
आर्यन ने चुनाव प्रचार के दौरान संगठन के बजाय सीधे छात्र समस्याओं को केंद्र में रखा। लाइब्रेरी, प्लेसमेंट, हॉस्टल और कॉलेज की अन्य सुविधाओं को लेकर छात्रों से सीधा संवाद किया गया। इससे उनका अभियान पारंपरिक संगठनात्मक चुनाव प्रचार से अलग नजर आया।
हॉस्टल का मुद्दा बना बड़ा चुनावी हथियार
छात्रों की समस्याओं के बीच हॉस्टल का मुद्दा भी प्रमुख रहा। आर्यन ने घोषणा की थी कि जब तक कॉलेज में हॉस्टल नहीं बनेगा, वह नंगे पैर रहेंगे। उनका यह संकल्प छात्रों के बीच चर्चा का विषय बना और उन्होंने इसे छात्रहित के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के तौर पर प्रचारित किया।
एमबीपीजी में लंबे समय से हॉस्टल, लाइब्रेरी और प्लेसमेंट जैसी सुविधाओं को लेकर छात्र आवाज उठाते रहे हैं। चुनाव में इन मुद्दों को लेकर नाराजगी का माहौल होने की चर्चा थी। आर्यन ने इसी नाराजगी को अपने अभियान से जोड़ने का प्रयास किया और छात्रों के बीच सीधे पहुंच बनाई।
एनएसयूआई को भी नहीं मिला बगावत का फायदा
एबीवीपी में हुई बगावत के बाद एनएसयूआई प्रत्याशी मेहुल साह के खेमे को उम्मीद थी कि संगठन का वोट बंटने से उन्हें सीधा लाभ मिलेगा। लेकिन परिणाम में यह गणित काम नहीं आया। एबीवीपी से अलग हुआ वोट बड़ी संख्या में आर्यन के खाते में चला गया।
आर्यन ने न केवल एबीवीपी के परंपरागत वोट में सेंध लगाई, बल्कि नए मतदाताओं और कॉलेज के अन्य छात्र समूहों के बीच भी अपनी पकड़ बनाई। दूसरी ओर मेहुल साह एबीवीपी के विभाजित वोट का अपेक्षित लाभ हासिल नहीं कर सके।
बड़े नेताओं का समर्थन भी नहीं बदल पाया परिणाम
एबीवीपी प्रत्याशी धीरज बिष्ट को संगठन का समर्थन मिलने के साथ ही भाजपा और एबीवीपी से जुड़े कई प्रभावशाली नेताओं का समर्थन भी मिला था। चुनाव प्रचार में संगठन की पूरी ताकत झोंकी गई। इसके बावजूद धीरज बिष्ट का तीसरे स्थान पर रहना परिणाम का सबसे बड़ा चौंकाने वाला पहलू माना जा रहा है।
पिछले चुनाव में एबीवीपी के अभिषेक गोस्वामी ने अध्यक्ष पद पर 1738 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। ऐसे में इस बार एबीवीपी के अधिकृत प्रत्याशी का तीसरे स्थान पर पहुंचना कॉलेज की छात्र राजनीति में आए बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।
चुनाव परिणाम के बाद एबीवीपी खेमे में कथित अति आत्मविश्वास को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। संगठन का मजबूत नेटवर्क और प्रभावशाली लोगों का समर्थन होने के कारण समर्थकों को जीत का भरोसा था। दूसरी तरफ आर्यन लगातार छात्रों के बीच व्यक्तिगत संपर्क बढ़ाने में जुटे रहे।

