CEC ज्ञानेश कुमार को फिलहाल राहत, सुप्रीम कोर्ट ने नहीं लगाई रोक, एकतरफा फैसलों के आरोपों पर चुनाव आयोग से जवाब तलब

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नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज को लेकर उठे विवाद पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। अदालत ने ज्ञानेश कुमार को अंतरिम रूप से पद से हटाने या उनके कामकाज पर रोक लगाने की मांग पर फिलहाल कोई आदेश देने से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है। अब आयोग के जवाब और संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर आगे की सुनवाई होगी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने निर्वाचन आयोग के दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना कुछ महत्वपूर्ण फैसले लिए।

क्या है पूरा विवाद?

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चुनाव संबंधी महत्वपूर्ण शक्तियां अकेले सीईसी की नहीं, बल्कि पूरे निर्वाचन आयोग की सामूहिक शक्तियां हैं। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 के संबंधित कानून का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि आयोग की निर्णय प्रक्रिया में निर्धारित व्यवस्था का पालन किया जाना जरूरी है।

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राकेश कुमार सिंह की याचिका में मांग की गई है कि अंतिम सुनवाई तक ज्ञानेश कुमार सीईसी के रूप में कार्य न करें और आयोग का काम अन्य दोनों निर्वाचन आयुक्तों की सर्वसम्मत राय से संचालित हो। वहीं अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए स्वतंत्र न्यायिक जांच आयोग या एसआईटी गठित करने की मांग की गई है।

SIR से जुड़े फैसले भी सवालों के घेरे में

मामले में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े फैसलों को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि कुछ फैसले, दिशानिर्देश और सॉफ्टवेयर में बदलाव अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना किए गए।

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए याचिकाओं में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की थी। दोनों आयुक्तों ने कुछ मामलों में फैसले उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना लिए जाने की बात कही थी।

फॉर्म-6 और सॉफ्टवेयर पर भी सवाल

याचिका में मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में पूर्वजों की जानकारी और पिछली मतदाता सूची के SIR से जुड़े विवरण जैसी शर्तें सॉफ्टवेयर के माध्यम से जोड़े जाने का भी दावा किया गया है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इन बदलावों के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

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गोवा में पात्र मतदाताओं को दोबारा सूची में शामिल करने से जुड़ी कथित सॉफ्टवेयर समस्या और पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में अपीलों का भी याचिका में उल्लेख किया गया है।

अब आयोग के जवाब पर टिकी नजर

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सीईसी के खिलाफ कोई अंतरिम कार्रवाई नहीं की है। अदालत ने पहले निर्वाचन आयोग का पक्ष जानने का फैसला किया है। ऐसे में अगली सुनवाई में आयोग का जवाब और संबंधित दस्तावेज अहम होंगे।

याचिकाकर्ताओं के आरोपों के विपरीत निर्वाचन आयोग का कहना है कि किसी संस्था के भीतर विचारों या टिप्पणियों में अंतर होना असामान्य नहीं है और उसके आदेश कानूनी रूप से वैध हैं।

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