भारत पर फिर टैरिफ की तैयारी में अमेरिका, ट्रंप प्रशासन के नए प्रस्ताव से बढ़ सकती है व्यापारिक तनातनी

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वॉशिंगटन/नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी है, लेकिन इसी बीच ट्रंप प्रशासन ने भारत समेत 60 देशों पर नए अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव देकर नई व्यापारिक बहस छेड़ दी है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने आरोप लगाया है कि ये देश जबरन श्रम (Forced Labor) से बने उत्पादों के आयात और निर्यात पर प्रभावी रोक लगाने में विफल रहे हैं, जिससे अमेरिकी व्यापार और श्रमिकों को नुकसान पहुंच रहा है।

USTR की ओर से जारी निष्कर्षों के अनुसार, भारत उन देशों में शामिल है जिन पर 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। यह प्रस्ताव अमेरिकी व्यापार कानून 1974 की धारा 301 (Section 301) के तहत की गई जांच के बाद सामने आया है।

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अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर ने कहा कि प्रमुख व्यापारिक साझेदारों द्वारा जबरन श्रम से निर्मित वस्तुओं के व्यापार को रोकने में विफलता स्वीकार्य नहीं है। उनके अनुसार इससे अमेरिकी श्रमिकों को वैश्विक बाजार में असमान प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।

भारत के अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, सऊदी अरब, सिंगापुर, ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात सहित कई बड़े व्यापारिक साझेदार भी इस जांच और प्रस्तावित कार्रवाई के दायरे में हैं।

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USTR ने इस प्रस्ताव पर सार्वजनिक टिप्पणियां मांगी हैं। 6 जुलाई तक सुझाव आमंत्रित किए गए हैं, जबकि 7 जुलाई को इस मुद्दे पर सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की जाएगी। अंतिम निर्णय इसके बाद लिया जाएगा। फिलहाल यह केवल प्रस्ताव है और अभी लागू नहीं हुआ है।

इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसी समय भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर बातचीत जारी है। दोनों देशों के बीच बाजार पहुंच, कृषि, डिजिटल व्यापार और शुल्क संबंधी मुद्दों पर कई दौर की वार्ता हो चुकी है। ऐसे में प्रस्तावित टैरिफ को व्यापार वार्ताओं पर दबाव बनाने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।

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भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने संकेत दिया है कि वह इस मामले पर अमेरिका के साथ संवाद जारी रखे हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अतिरिक्त शुल्क लागू होता है तो भारतीय निर्यातकों, विशेषकर वस्त्र, परिधान और श्रम-प्रधान उद्योगों पर इसका असर पड़ सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय से पहले दोनों देशों के बीच बातचीत की गुंजाइश बनी हुई है।

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