पीएम आवास योजना के तहत पुनर्वास का विकल्प, 31 मार्च तक आवेदन करने पर जोर
नई दिल्ली/हल्द्वानी। Supreme Court of India ने मंगलवार को हल्द्वानी में रेलवे की भूमि पर अतिक्रमण के मामले में स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि वहां रहने वाले लोगों को उस जमीन पर बने रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि यह निर्विवाद रूप से रेलवे की सार्वजनिक भूमि है और इस पर अवैध कब्जे को अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रखा जा सकता। अदालत की टिप्पणी से संकेत मिलता है कि प्रस्तावित रेलवे विस्तार परियोजना के मद्देनज़र 5,000 से अधिक परिवारों को विवादित भूमि खाली करनी पड़ सकती है।
पीएम आवास योजना के लिए विशेष अभियान
पीठ ने केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि क्षेत्र में रहने वाले परिवारों की पात्रता सुनिश्चित कर उन्हें Pradhan Mantri Awas Yojana (पीएमएवाई) का लाभ दिलाने की प्रक्रिया तेज की जाए।
नैनीताल के जिलाधिकारी, हल्द्वानी के उपजिलाधिकारी और जिला विधि सेवा प्राधिकरण को क्षेत्र का दौरा कर शिविर लगाने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि परिवार आवेदन फॉर्म भर सकें और आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर सकें। अदालत ने कहा कि यदि पात्र परिवार 31 मार्च तक आवेदन जमा कर दें तो यह संतोषजनक होगा। जिलाधिकारी और राज्य विधि सेवा प्राधिकरण के सचिव को वस्तुस्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को भी कहा गया है।
कोर्ट में क्या हुई बहस
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Prashant Bhushan ने दलील दी कि उनके मुवक्किल चार से पांच दशकों से वहां रह रहे हैं और राज्य सरकार ने क्षेत्र को विनियमित करने का आश्वासन दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि रेलवे को विस्तार के लिए पूरी जमीन की आवश्यकता नहीं है।
इस पर न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि “यह रेलवे की सार्वजनिक भूमि है। आप इसे रहने का अधिकार नहीं कह सकते। यह केवल अधिकारियों की उदारता का परिणाम है कि वर्षों तक अवैध गतिविधियों को नजरअंदाज किया गया।”
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अदालत रेलवे को परियोजना स्थानांतरित करने का निर्देश नहीं दे सकती, क्योंकि यह विशेषज्ञों का विषय है।
एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने धार्मिक स्थलों और पुनर्वास की आवश्यकता का मुद्दा उठाया। इस पर न्यायालय ने कहा कि खराब परिस्थितियों में रह रहे लोगों को बेहतर आवास का अवसर दिया जाना चाहिए और यदि कोई बाधा आती है तो अदालत हस्तक्षेप करेगी।
रेलवे और केंद्र का पक्ष
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि हल्द्वानी रेलवे विस्तार के लिए अंतिम समतल क्षेत्र है, क्योंकि इसके बाद पहाड़ी इलाका शुरू हो जाता है। उन्होंने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व मानसून में नदी का पानी पटरियों में घुस गया था, जिससे बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा।
सरकार ने कहा कि पात्र विस्थापित परिवारों को उत्तराखंड या उत्तर प्रदेश में पीएमएवाई के तहत आवास दिया जा सकता है। आवश्यकता होने पर छह महीने तक प्रति माह 2,000 रुपये की सहायता भी दी जाएगी। 13 निवासियों की निजी भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया भी राज्य सरकार द्वारा की जाएगी।
अप्रैल में अगली सुनवाई
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई अप्रैल तक स्थगित कर दी है। उल्लेखनीय है कि 24 जुलाई 2024 को भी शीर्ष अदालत ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव को पुनर्वास के लिए केंद्र और रेलवे अधिकारियों के साथ बैठक करने के निर्देश दिए थे।
रेलवे के अनुसार संबंधित भूमि पर 4,365 अतिक्रमणकारी हैं, जबकि स्थानीय लोग स्वयं को वैध निवासी बताते हुए विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। अब निगाहें अप्रैल की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां पुनर्वास, पात्रता और रेलवे विस्तार परियोजना को लेकर आगे की दिशा तय होगी।
