‘चीर बंधन’ पर बनी अनूठी डॉक्यूमेंट्री रिलीज, उत्तराखंड की लोक परंपरा के मनोवैज्ञानिक रहस्यों से उठाया पर्दा

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हल्द्वानी/अल्मोड़ा। उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और सदियों पुरानी होली परंपरा ‘चीर बंधन’ को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती एक विशेष डॉक्यूमेंट्री रिलीज़ की गई है। युवा फिल्मकार विपुल जोशी के निर्देशन में तैयार इस वृत्तचित्र में ‘चीर बंधन’ को केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

डॉक्यूमेंट्री इस सवाल का जवाब तलाशती है कि क्या ‘चीर बंधन’ केवल एक उत्सव है, या इसके पीछे समाज को जोड़ने वाली कोई गहरी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया भी काम करती है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ और तनाव के दौर में यह परंपरा किस तरह लोगों को अपनी जड़ों, सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक चेतना से जोड़ती है, इसे विशेषज्ञों के विश्लेषण और स्थानीय अनुभवों के माध्यम से प्रभावी ढंग से दर्शाया गया है।

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फिल्म में बताया गया है कि ‘चीर बंधन’ केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि ‘कलेक्टिव कॉन्शसनेस’ (सामूहिक चेतना) और ‘कलेक्टिव हीलिंग’ (सामूहिक उपचार) जैसी अवधारणाओं से भी जुड़ा हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परंपरा समाज में सकारात्मक ऊर्जा, भावनात्मक जुड़ाव, सामाजिक समरसता और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना को मजबूत करती है। यही कारण है कि सदियों बाद भी यह लोक परंपरा उत्तराखंड के सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।

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डॉक्यूमेंट्री का फिल्मांकन अल्मोड़ा जिले के माला (सोमेश्वर) और अल्मोड़ा नगर में चीर बंधन (होली) आयोजन के दौरान किया गया। इसमें स्थानीय नागरिकों के साथ विभिन्न विषय विशेषज्ञों ने इस परंपरा के धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर विस्तार से अपने विचार साझा किए हैं।

डॉक्यूमेंट्री में प्रो. इला साह (समाजशास्त्र), प्रो. आराधना शुक्ला (मनोविज्ञान), डॉ. रुचि तिवारी, डॉ. ललित योगी, त्रिभुवन गिरी महाराज सहित कई विशेषज्ञों ने अपनी सहभागिता निभाई है। वॉयस ओवर सुनीता भास्कर ने दिया है, जबकि विषयगत सहयोग संतोष जोशी, संपादन अतुल त्रिपाठी और विजुअल आर्ट में Google Gemini का सहयोग लिया गया है।

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निर्देशक विपुल जोशी का कहना है कि इस डॉक्यूमेंट्री का उद्देश्य उत्तराखंड की लोक परंपराओं को केवल धार्मिक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि उनके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक महत्व के साथ नई पीढ़ी और व्यापक समाज के सामने प्रस्तुत करना है, ताकि सांस्कृतिक विरासत के प्रति लोगों में नई समझ और जागरूकता विकसित हो सके।

डॉक्यूमेंट्री देखें:

https://youtu.be/IXtWMk3NIFE?si=xqiYimkEaf7exkz9

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