Nainital: आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी की जन्मशती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, स्मारक डाक टिकट का हुआ विमोचन

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नैनीताल/नई दिल्ली। प्रख्यात संस्कृत विद्वान, सांस्कृतिक चिन्तक और आध्यात्मिक मनीषी आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी की जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से भव्य राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। 15 मई 2026 को श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में देशभर से विद्वानों, शोधार्थियों और संस्कृत प्रेमियों ने भाग लेकर आचार्य जोशी के योगदान को श्रद्धापूर्वक याद किया।

कार्यक्रम का आयोजन साहित्य अकादेमी, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के संयुक्त सहयोग से किया गया। इस अवसर पर आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी की स्मृति में स्मारक डाक टिकट का भी विमोचन किया गया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव समर नंदा ने बताया कि केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय क्रियान्वयन समिति ने 11 अप्रैल 2026 से 11 अप्रैल 2027 तक देशभर में आचार्य जोशी की स्मृति में शैक्षिक संगोष्ठियाँ, सांस्कृतिक आयोजन, प्रदर्शनियाँ और आध्यात्मिक सभाएँ आयोजित करने का निर्णय लिया है।

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उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के नैनीताल जनपद के मटेला गांव में 11 अप्रैल 1926 को जन्मे आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी ने कठिन परिस्थितियों में भी संस्कृत, भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के संरक्षण के लिए आजीवन कार्य किया। उन्होंने संस्कृत पत्रकारिता, योग, आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र और पांडुलिपि संरक्षण जैसे क्षेत्रों में युवाओं को प्रेरित किया।

समर नंदा ने कहा कि आचार्य जोशी के सतत प्रयासों का ही परिणाम था कि वर्ष 2010 में संस्कृत को उत्तराखंड की द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ। उन्होंने इसे भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक अस्मिता के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया।

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राष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ. माधव कौशिक ने कहा कि आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी प्राचीन ऋषि परंपरा के प्रतिनिधि थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति के वास्तविक स्वरूप को समाज तक पहुंचाने का कार्य किया। वहीं प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने कहा कि आचार्य जोशी का पूरा जीवन संस्कृत साहित्य, वैदिक संस्कृति और समाज सेवा को समर्पित रहा।

प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने अपने संबोधन में कहा कि उत्तराखंड की भूमि से संस्कृत ज्ञान की धारा सदियों से प्रवाहित होती रही है और आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी ने उसे नई ऊर्जा प्रदान की। उन्होंने घोषणा की कि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय आचार्य जोशी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रमों के लिए आर्थिक सहयोग भी देगा।

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कार्यक्रम के दौरान विभिन्न शैक्षिक सत्रों में देशभर से आए विद्वानों ने आचार्य जोशी के संस्कृत, वैदिक संस्कृति, पुराणिक परंपरा, तीर्थ संस्कृति और भारतीय संस्कारों के संरक्षण में योगदान पर शोधपत्र प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने कहा कि आचार्य जोशी का जीवन भारतीय सांस्कृतिक चेतना और संस्कृत भाषा के पुनर्जागरण का प्रेरणास्रोत बना रहेगा।

समापन सत्र में साहित्य अकादेमी की संस्कृत परामर्श मंडल के संयोजक प्रो. हरेकृष्ण शतपथी ने कहा कि आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी का संपूर्ण जीवन संस्कृत और सनातन संस्कृति के संरक्षण को समर्पित रहा। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करता रहेगा।

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