कल रखा जाएगा कामिका एकादशी का व्रत, स्मार्त और वैष्णव दोनों के लिए एक ही दिन मान्य

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हल्द्वानी। श्रावण मास की महत्वपूर्ण कामिका एकादशी का व्रत इस वर्ष 9 अगस्त 2026, रविवार को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस बार स्मार्त और वैष्णव दोनों के लिए कामिका एकादशी का व्रत रविवार को ही करना शास्त्रसम्मत है। एकादशी तिथि सूर्योदय से सुबह 11 बजकर 5 मिनट तक रहने के कारण सभी श्रद्धालुओं के लिए इसी दिन व्रत रखने का विधान बताया गया है।

ज्योतिषाचार्य डा. नवीन चन्द्र जोशी के अनुसार, श्रावण मास में आने वाली कामिका एकादशी को विशेष महत्व प्राप्त है। इस दिन भगवान नारायण की पूजा-अर्चना के साथ भगवान आशुतोष शिव की आराधना भी की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि कामिका एकादशी का व्रत मनुष्य को सांसारिक दुःखों से निवृत्ति की ओर ले जाता है और भगवत प्राप्ति की कामना को पूर्ण करने वाला होता है।

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धर्माचार्यों के अनुसार एकादशी का अर्थ केवल अन्न का त्याग करना नहीं है। मनुष्य के जीवन में मन सहित दस इंद्रियों को मिलाकर एकादश इंद्रियों का उल्लेख किया गया है। इन इंद्रियों को वश में करना और मन को नियंत्रित रखना ही एकादशी उपवास का वास्तविक उद्देश्य माना गया है। जब मनुष्य अपनी इच्छाओं, भोग और विकारों पर नियंत्रण स्थापित करता है, तभी वह परम तत्व और परमात्मा को समझने की दिशा में आगे बढ़ता है।

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एकादशी को सनातन परंपरा में सभी व्रतों का राजा कहा गया है। व्रत का तात्पर्य तप से है और बिना तप के किसी भी कार्य अथवा लक्ष्य की पूर्ण प्राप्ति संभव नहीं मानी गई है। ‘देवो भूत्वा देवं यजेत’ अर्थात स्वयं देवतुल्य बनकर देवता की आराधना करना ही वास्तविक पूजा, यज्ञ और व्रत का उद्देश्य है। इस दृष्टि से व्रत मनुष्य को केवल धार्मिक अनुशासन ही नहीं सिखाता, बल्कि उसे संयमित और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है।

चातुर्मास में आने वाली इस एकादशी पर सायंकाल तुलसी पूजन का भी विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालुओं को शाम के समय तुलसी के पौधे के समीप दीप प्रज्वलित कर भगवान विष्णु का स्मरण और पूजा-अर्चना करनी चाहिए। भगवान नारायण को तुलसी अत्यंत प्रिय मानी गई हैं, इसलिए एकादशी के दिन तुलसी पूजन को विशेष फलदायी माना जाता है।

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व्रत के दौरान श्रद्धालुओं को अपनी क्षमता के अनुसार सात्विक आहार और संयमित दिनचर्या अपनानी चाहिए। धार्मिक दृष्टि से एकादशी का मूल उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म में संयम लाना है। इस दिन भगवान विष्णु का ध्यान, मंत्र जाप, पूजा-पाठ और धार्मिक चिंतन करने से मन को एकाग्र करने में सहायता मिलती है।

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