पश्चिमी सोच के असर से बढ़ रहे बिना शादी के संबंध, कानून का दुरुपयोग भी चिंता का विषय: कोर्ट

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नई दिल्ली : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज से जुड़ी एक आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर अहम और गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि पश्चिमी विचारधारा के प्रभाव में बिना शादी के साथ रहने की प्रवृत्ति युवाओं में तेजी से बढ़ रही है। ऐसे रिश्ते जब विफल होते हैं, तो अक्सर आपराधिक मामले दर्ज कर दिए जाते हैं और मौजूदा कानूनों के तहत पुरुषों को दोषी ठहराया जाता है, जबकि ये कानून उस दौर में बनाए गए थे जब लिव-इन की अवधारणा अस्तित्व में नहीं थी।

Impact of Live-in Relationships on Criminal Law: हाईकोर्ट ने कहा कि कई मामलों में सहमति से बने रिश्तों के टूटने के बाद FIR दर्ज होती है और चूंकि कानून महिलाओं के पक्ष में झुका हुआ है, इसलिए पुरुषों को गंभीर धाराओं में फंसा दिया जाता है। कोर्ट ने इसे आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक गंभीर चुनौती बताया।

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इन्हीं टिप्पणियों के आधार पर हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया। यह फैसला जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस प्रशांत मिश्रा की खंडपीठ ने सुनाया।

2021 का मामला, 2024 में आया था ट्रायल कोर्ट का फैसला
यह पूरा मामला वर्ष 2021 का है। मार्च 2024 में महाराजगंज की POCSO कोर्ट ने आरोपी चंद्रेश को IPC, POCSO एक्ट और SC/ST एक्ट के तहत दोषी ठहराया था। कोर्ट ने अलग-अलग धाराओं में उसे 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा सुनाई थी।
ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को अप्रैल 2024 में चंद्रेश ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

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शादी का झांसा देकर संबंध बनाने का आरोप
अभियोजन पक्ष के अनुसार, चंद्रेश पर आरोप था कि उसने शादी का वादा कर एक नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर बेंगलुरु ले गया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। पीड़िता 6 अगस्त 2021 को अपने घर लौट आई थी और उसने बताया कि आरोपी ने शादी का वादा किया था, लेकिन बाद में उससे मुकर गया।
लड़की के पिता ने दावा किया था कि उनकी बेटी नाबालिग है और आधार कार्ड के अनुसार उसकी जन्मतिथि 1 मार्च 2003 है।

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हाईकोर्ट का अहम संकेत
हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों, सहमति, उम्र से जुड़े साक्ष्यों और कानून की व्याख्या पर गंभीरता से विचार करते हुए कहा कि हर असफल संबंध को आपराधिक रंग देना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि लिव-इन जैसे मामलों में मौजूदा कानूनों की व्याख्या समय और सामाजिक बदलावों के अनुरूप होनी चाहिए।

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