धान रोपाई के साथ गाए जाने वाले लोकगीतों की संस्कृति पर आधुनिकता का असर, नई पीढ़ी से दूर होती जा रही सदियों पुरानी विरासत
उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल में इन दिनों धान रोपाई का मौसम पूरे जोरों पर है। पहाड़ों पर बरसात की रिमझिम फुहारों के बीच सीढ़ीनुमा खेतों में काम करती महिलाओं की तस्वीरें आज भी ग्रामीण जीवन की सुंदरता और मेहनतकश संस्कृति की झलक पेश करती हैं। लेकिन इस बदलते दौर में एक ऐसी लोक परंपरा भी धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही है, जिसने सदियों तक पहाड़ की खेती, संस्कृति और सामाजिक जीवन को जीवंत बनाए रखा। यह परंपरा है ‘हुड़किया बौल’, जिसकी गूंज कभी कुमाऊँ के खेतों, गांवों और घाटियों की पहचान हुआ करती थी।
जब रोपाई केवल खेती नहीं, पूरे गांव का उत्सव होती थी
आज से कुछ दशक पहले तक कुमाऊँ के अधिकांश गांवों में धान रोपाई का स्वरूप बिल्कुल अलग था। रोपाई केवल कृषि कार्य नहीं बल्कि सामूहिक उत्सव का रूप ले लेती थी। गांव के लोग बारी-बारी से एक-दूसरे के खेतों में श्रमदान करते थे और पूरे गांव की सहभागिता से रोपाई का कार्य पूरा होता था।
खेतों में महिलाओं की लंबी कतारें धान की पौध रोपती थीं और उनके बीच खड़ा एक लोकगायक अपने हाथ में पारंपरिक वाद्य यंत्र हुड़का लेकर लोकगीतों की स्वर लहरियां बिखेरता था। इन गीतों को ही ‘हुड़किया बौल’ कहा जाता है। हुड़के की थाप और गीतों की लय के साथ रोपाई का काम चलता था, जिससे कठिन श्रम भी उत्सव जैसा महसूस होता था।
लोकजीवन, प्रकृति और आस्था का अनूठा संगम
हुड़किया बौल केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था, बल्कि लोकजीवन का जीवंत दस्तावेज भी माना जाता है। इन गीतों में प्रकृति, ऋतु परिवर्तन, खेती-बाड़ी, लोकदेवताओं, प्रेम, विरह, सामाजिक संबंधों और ग्रामीण जीवन की अनेक भावनाएं समाहित होती थीं।
गीतों की मधुर धुन और हुड़के की ताल खेतों में काम कर रही महिलाओं के उत्साह को बनाए रखती थी। यही कारण था कि घंटों तक चलने वाला कठिन श्रम भी थकान का एहसास नहीं होने देता था। ग्रामीणों के अनुसार, रोपाई के मौसम में दूर-दूर तक गूंजती हुड़के की आवाज गांवों की पहचान बन चुकी थी।
एक परिवार नहीं, पूरा गांव होता था मेजबान
उस दौर में जिस परिवार के खेत में रोपाई होती थी, उस दिन पूरे गांव के लोग उसी परिवार के यहां भोजन करते थे। सुबह का नाश्ता और दोपहर का भोजन सामूहिक रूप से तैयार होता था। घर-आंगन लोगों की आवाजाही से भरे रहते थे और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी इस आयोजन का हिस्सा बनते थे।
यह परंपरा केवल खेती तक सीमित नहीं थी, बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारे का प्रतीक भी थी। सामूहिक श्रम के माध्यम से गांवों में सहयोग और आत्मीयता की भावना मजबूत होती थी। लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते थे और यही सामूहिकता पहाड़ की असली ताकत मानी जाती थी।
समय के साथ बदल गई तस्वीर
पिछले कुछ वर्षों में ग्रामीण समाज और कृषि व्यवस्था में आए बदलावों ने इस परंपरा को गहरा आघात पहुंचाया है। भूमि बंटवारे के कारण खेत छोटे होते गए और अब एक ही समय में कई परिवारों की रोपाई होने लगी है। ऐसे में पूरे गांव का एक साथ किसी एक खेत में जुटना लगभग असंभव हो गया है।
इसके अलावा, गांवों से लगातार हो रहा पलायन, कृषि कार्यों में घटती रुचि, आधुनिक जीवनशैली और बदलती सामाजिक संरचना ने भी इस परंपरा को कमजोर किया है। अब खेतों में लोकगायकों की जगह मोबाइल फोन और आधुनिक उपकरणों ने ले ली है। नई पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसने न तो कभी खेतों में हुड़किया बौल सुना है और न ही उस सामूहिक संस्कृति को करीब से देखा है, जो कभी पहाड़ की पहचान हुआ करती थी।
सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की चुनौती
लोकसंस्कृति के जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते संरक्षण के ठोस प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में हुड़किया बौल केवल इतिहास और पुस्तकों तक सीमित होकर रह जाएगा। यह केवल एक लोकगीत परंपरा का अंत नहीं होगा, बल्कि पहाड़ की सामूहिक संस्कृति और सामाजिक मूल्यों की एक महत्वपूर्ण विरासत भी खो जाएगी।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं और लोकमहोत्सवों के माध्यम से इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजित होने वाले कृषि और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हुड़किया बौल को विशेष स्थान दिया जाना चाहिए।
पहचान बचाने की जरूरत
आज कुमाऊँ के खेत धान की हरियाली से जरूर लहलहा रहे हैं, लेकिन उन खेतों में गूंजने वाली लोकधुनों की कमी साफ महसूस की जा सकती है। हुड़के की थाप और सामूहिक श्रम की वह संस्कृति अब धीरे-धीरे यादों में सिमटती जा रही है।
फिर भी उम्मीद बाकी है। यदि समाज, संस्कृति प्रेमी और प्रशासन मिलकर प्रयास करें, तो यह परंपरा एक बार फिर नई ऊर्जा के साथ जीवित हो सकती है। क्योंकि लोकसंस्कृति केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सांस्कृतिक पहचान भी होती है।

