सरकारी अस्पताल में खुली लूट!…हल्द्वानी STH में आदेशों को ठेंगा, गरीब मरीजों पर बाहर की दवा का बोझ

खबर शेयर करें

लक्ष्मण मेहरा, हल्द्वानी।
कुमाऊं के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल डॉ. सुशीला तिवारी चिकित्सालय (STH) में सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता एक बार फिर उजागर हुई है। गरीबों के इलाज के लिए बने इस सरकारी अस्पताल में कुछ डॉक्टर खुलेआम सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए मरीजों को बाहर की महंगी दवाएं लिख रहे हैं।

हालात यह हैं कि राजकीय मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी के प्राचार्य डॉ. जीएस तितियाल और अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक (एमएस) डॉ. अरुण जोशी के बार-बार सख्त निर्देशों का भी इन लापरवाह चिकित्सकों पर कोई असर नहीं पड़ रहा। इसकी सीधी मार गरीब मरीजों और उनके परिजनों पर पड़ रही है, जो इलाज के नाम पर आर्थिक तंगी झेलने को मजबूर हैं।

Doctors Defy Govt Orders: एक ओर प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और स्वास्थ्य मंत्री सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारने और गरीबों को बेहतर इलाज देने के दावे कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुमाऊं के प्रवेश द्वार हल्द्वानी के डा. सुशीला तिवारी अस्पताल के भीतर बैठे कुछ डॉक्टर उन्हीं दावों की पोल खोल रहे हैं। इन डॉक्टरों की मनमानी के चलते बीपीएल, अटल आयुष्मान भारत योजना और जेएसएसके जैसी योजनाओं का लाभ मरीजों तक नहीं पहुंच पा रहा है। सरकारी योजनाएं कागजों तक सिमट कर रह गई हैं, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।

यह भी पढ़ें 👉  उत्तराखंड: वन क्षेत्रों के पास बढ़ेंगी ईको टूरिज्म गतिविधियां, जू-सफारी, चौरासी कुटिया और महासीर संरक्षण को सरकार की हरी झंडी

मरीजों की लगातार मिल रही शिकायतों के बाद आखिरकार प्राचार्य डॉ. जीएस तितियाल के निर्देश पर चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अरुण जोशी को सख्त रुख अपनाना पड़ा। उन्होंने अस्पताल के सभी विभागाध्यक्षों को जारी आदेश में साफ शब्दों में कहा है कि ओपीडी, भर्ती और सरकारी योजनाओं के तहत इलाज करा रहे मरीजों को केवल वही दवाएं लिखी जाएं, जो अस्पताल की फार्मेसी में उपलब्ध हैं। इसके बावजूद सवाल यह है कि आखिर इतने स्पष्ट आदेशों के बाद भी डॉक्टर क्यों नहीं सुधर रहे?

यह भी पढ़ें 👉  उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती, 34 संस्थानों में बीएससी नर्सिंग और जीएनएम की 1790 सीटों को मंजूरी

चिकित्सा अधीक्षक डॉ. जोशी की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि पूर्व में कई बार स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद कुछ चिकित्सकों द्वारा पर्चों पर बाहर की दवाएं लिखी जा रही हैं, जो किसी भी दृष्टिकोण से न्यायसंगत नहीं है। इस मुद्दे पर 24 दिसंबर 2025 को हुई बैठक में चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री ने भी नाराजगी जताई थी। इसके बाद निदेशक चिकित्सा शिक्षा द्वारा जारी कार्यवृत्त में भी स्पष्ट निर्देश दिए गए कि मरीजों को बाहर की दवा कदापि न लिखी जाए।

पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि सीएम हेल्पलाइन पोर्टल और अन्य शिकायत मंचों पर मरीज लगातार शिकायत कर रहे हैं कि ओपीडी व भर्ती मरीजों को डिस्चार्ज के समय बाहर से दवाएं लिखी जा रही हैं। इससे न केवल सरकार की छवि धूमिल होती है, बल्कि चिकित्सालय की प्रतिष्ठा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

यह भी पढ़ें 👉  वैवाहिक मंडप में पहुंची पुलिस...नाबालिग दुल्हन मिलने पर रुकवाई शादी, बिना दुल्हन लौट गई बरात

चिकित्सा अधीक्षक ने सभी विभागाध्यक्षों को निर्देशित किया है कि वे अपने अधीन यूनिट हेड्स, संकाय सदस्यों, सीनियर रेजिडेंट्स और पीजी/जूनियर रेजिडेंट्स को राजकीय नीतियों और अस्पताल फार्मेसी से दवा लिखने के नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराएं। साथ ही मासिक समीक्षा बैठकों में भी इस विषय को अनिवार्य रूप से उठाने के निर्देश दिए गए हैं।

स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि इसके बाद भी बाहर की दवा लिखने की शिकायत सामने आती है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित चिकित्सक की होगी और नियमानुसार कार्रवाई भी उसी के खिलाफ की जाएगी। पत्र की प्रतिलिपि प्राचार्य एवं डीन, वित्त नियंत्रक, फार्मेसी प्रभारी, नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट सहित अन्य संबंधित अधिकारियों को भी सूचनार्थ भेजी गई है।