UNGA में रूस-जर्मनी आमने-सामने, लावरोव ने जर्मनी से पूछा- क्या दूसरे विश्व युद्ध के सबक भूल गए?

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न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में रूस और जर्मनी के बीच लंबे समय से जारी तनाव एक बार फिर खुलकर सामने आया। जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल ने रूस से जर्मनी, यूरोप और नाटो के साथ बढ़ते तनाव को कम करने और टकराव की स्थिति से बाहर निकलने की अपील की। इसके जवाब में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने जर्मनी की मौजूदा विदेश और सुरक्षा नीति पर ही सवाल खड़े कर दिए।

दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की 26 सितंबर को न्यूयॉर्क में हुई मुलाकात विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही, क्योंकि रूस के फरवरी 2022 में यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने के हमले के बाद यह दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की पहली आमने-सामने बैठक थी। बैठक जर्मन पक्ष के अनुरोध पर हुई और इसमें द्विपक्षीय संबंधों तथा यूक्रेन युद्ध समेत कई मुद्दों पर चर्चा हुई।

वाडेफुल ने रूस से ‘खतरनाक रास्ते’ से पीछे हटने को कहा

जर्मन प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, वाडेफुल ने रूस से जर्मनी, यूरोप और नाटो की ओर बढ़ते तनाव के कथित ‘खतरनाक रास्ते’ को छोड़ने की अपील की। उन्होंने रूस के साथ भविष्य में बेहतर संबंधों की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया, लेकिन इसे यूक्रेन में युद्ध समाप्त करने की रूस की वास्तविक इच्छा से जोड़ा।

जर्मन पक्ष ने बातचीत के दौरान काला सागर के रास्ते अनाज निर्यात को बहाल करने की दिशा में भी कदम उठाने की अपील की। रॉयटर्स के अनुसार, वाडेफुल ने रूस से काला सागर के जरिए अनाज निर्यात को लेकर समझौते की दिशा में हरसंभव प्रयास करने को कहा।

लावरोव का पलटवार- क्या बर्लिन ने दूसरे विश्व युद्ध से सबक नहीं सीखा?

जर्मनी की ओर से तनाव कम करने की अपील के बीच लावरोव का रुख बेहद तीखा रहा। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन में उन्होंने जर्मनी पर यूक्रेन का प्रमुख समर्थक होने और यूरोप में बड़ी सैन्य शक्ति बनने की कोशिश करने का आरोप लगाया।

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लावरोव ने जर्मनी के मौजूदा सैन्य और विदेश नीति रुख के संदर्भ में द्वितीय विश्व युद्ध का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि क्या बर्लिन ने उस युद्ध से पर्याप्त सबक सीखा है। यह टिप्पणी रूस की ओर से जर्मनी की बढ़ती रक्षा भूमिका और यूक्रेन को उसके समर्थन पर जताई जा रही आपत्तियों के संदर्भ में आई।

2022 के बाद पहली बार हुई आमने-सामने बातचीत

वाडेफुल और लावरोव की मुलाकात करीब 20 मिनट चली। रूस के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों और यूक्रेन की स्थिति पर चर्चा की।

हालांकि बैठक के बाद लावरोव ने बातचीत को लेकर ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया। उन्होंने कहा कि जर्मन विदेश मंत्री ने वही बातें दोहराईं, जो जर्मनी पहले सार्वजनिक रूप से कह चुका है। लावरोव के मुताबिक, अगर यही बातचीत का परिणाम है तो सवाल उठता है कि इसे वास्तव में बातचीत कहा जाए या नहीं।

लीपजिग एयरपोर्ट ड्रोन घटना से भी बढ़ा तनाव

मॉस्को और बर्लिन के संबंधों में हालिया तनाव का एक कारण जर्मनी के लीपजिग/हाले एयरपोर्ट से जुड़ी ड्रोन घटना भी है। रॉयटर्स के मुताबिक, अगस्त में हुई इस घटना के बाद जर्मनी और रूस के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हुए।

जर्मन पक्ष ने घटना के पीछे रूस की भूमिका होने का आरोप लगाया, जबकि रूसी पक्ष ने इस दावे पर सवाल उठाए। लावरोव ने कथित ड्रोन की जिम्मेदारी तय करने के जर्मन दावे को चुनौती देते हुए पूछा कि जब किसी ने उस ड्रोन की जिम्मेदारी नहीं ली, तो उसे रूसी ड्रोन कैसे माना गया।

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इस मुद्दे पर दोनों देशों के दावों में स्पष्ट अंतर सामने आया है।

काला सागर और जहाजों पर भी आमने-सामने दावे

बातचीत के दौरान काला सागर में जहाजों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठा। जर्मनी ने काला सागर के रास्ते अनाज निर्यात को फिर से सुरक्षित बनाने की जरूरत पर जोर दिया।

रूसी विदेश मंत्री ने दूसरी ओर कहा कि रूस भारत, मिस्र और तुर्किये के साथ काला सागर में सुरक्षित नौवहन को लेकर प्रस्तावों पर चर्चा कर रहा है। उन्होंने जहाजों पर हमलों को लेकर रूस और यूक्रेन के बीच अलग-अलग दावों का भी उल्लेख किया।

अमेरिका और पश्चिम पर भी लावरोव के आरोप

लावरोव ने संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन और बाद की प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमेरिका तथा पश्चिमी देशों की नीतियों पर भी निशाना साधा। रूसी विदेश मंत्री ने आरोप लगाया कि पश्चिमी देश रूस को रणनीतिक रूप से कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने अमेरिकी नीतियों को यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े विवादों के संदर्भ में भी उठाया और रूस की ओर से यूक्रेन संघर्ष को लेकर अपनी पुरानी सुरक्षा संबंधी दलीलों को दोहराया। इन दावों को रूस के आधिकारिक रुख के रूप में देखा जाना चाहिए; पश्चिमी देश रूस के यूक्रेन पर आक्रमण को अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के रूप में देखते हैं।

जर्मनी और जापान की स्थायी सीट का रूस ने किया विरोध

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का मुद्दा भी लावरोव के बयान में प्रमुख रहा। रूस ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने का समर्थन तो किया है, लेकिन पश्चिमी देशों के लिए नई स्थायी सीटों को लेकर उसका रुख अलग है।

लावरोव ने जर्मनी और जापान को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता दिए जाने के विचार का विरोध किया और कहा कि सुरक्षा परिषद में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका का प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए। उन्होंने भारत और ब्राजील की स्थायी सदस्यता की दावेदारी के लिए रूस के समर्थन को भी दोहराया।

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यह मुद्दा भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि नई दिल्ली लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग कर रही है।

रूस-यूक्रेन के बीच जारी है हवाई हमलों का दौर

रूस और जर्मनी के बीच कूटनीतिक टकराव ऐसे समय सामने आया है जब रूस और यूक्रेन के बीच सैन्य संघर्ष जारी है। दोनों पक्ष हवाई हमलों में ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाल के दिनों में दोनों देशों की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ हमलों और नुकसान के दावे सामने आते रहे हैं।

रूस और यूक्रेन अपने-अपने सैन्य नुकसान के पूरे आंकड़े सार्वजनिक नहीं करते हैं। इसलिए दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग संदर्भ में देखना जरूरी है।

रिश्ते सुधारने की संभावना, लेकिन मतभेद गहरे

न्यूयॉर्क में वाडेफुल और लावरोव की बैठक ने दोनों देशों के बीच संवाद का एक माध्यम जरूर खोला है, लेकिन बैठक के बाद आए बयानों से यह स्पष्ट है कि यूक्रेन युद्ध, यूरोपीय सुरक्षा, नाटो, जर्मनी की सैन्य भूमिका और रूस की सुरक्षा चिंताओं को लेकर दोनों पक्षों की स्थितियों में बड़ा अंतर बना हुआ है।

जर्मनी की ओर से रूस से तनाव कम करने और यूक्रेन युद्ध समाप्त करने की अपील की जा रही है, जबकि रूस जर्मनी और पश्चिमी देशों की नीतियों को अपने खिलाफ बढ़ते रणनीतिक दबाव के रूप में देखता है। ऐसे में 2022 के बाद हुई यह पहली उच्चस्तरीय आमने-सामने बातचीत संवाद की वापसी का संकेत तो देती है, लेकिन तत्काल किसी समझौते या बड़े कूटनीतिक बदलाव की पुष्टि नहीं करती।

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