नई दिल्ली। आज पृथ्वी की कक्षा में हजारों सैटेलाइट काम कर रहे हैं। ये सैटेलाइट मौसम की निगरानी, संचार, ग्रीनहाउस गैस मापन और दूर के तारों के अध्ययन जैसे कई महत्वपूर्ण काम करते हैं। लेकिन हर मशीन की तरह सैटेलाइट भी हमेशा नहीं चलते। समय के साथ वे पुराने या खराब हो जाते हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों को उन्हें सुरक्षित तरीके से हटाना पड़ता है, ताकि अंतरिक्ष में खतरा न बढ़े।
सैटेलाइट को हटाने के दो प्रमुख तरीके
वैज्ञानिक सैटेलाइट की ऊंचाई के आधार पर उन्हें हटाने के दो तरीके अपनाते हैं।
1. लो अर्थ ऑर्बिट से गिराकर जलाना
जो सैटेलाइट लो अर्थ ऑर्बिट में होते हैं, उन्हें पृथ्वी के वायुमंडल में वापस गिराया जाता है। इंजीनियर सैटेलाइट में बचे हुए ईंधन से उसकी गति कम कर देते हैं, जिससे वह अपनी कक्षा से नीचे आ जाता है।
जब सैटेलाइट पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करता है तो तेज गति और हवा के घर्षण से इतनी गर्मी पैदा होती है कि वह जलकर नष्ट हो जाता है। छोटे सैटेलाइट आमतौर पर पूरी तरह जल जाते हैं, इसलिए उनका मलबा जमीन तक नहीं पहुंचता।
बड़े अंतरिक्ष यानों के लिए ‘स्पेसक्राफ्ट कब्रिस्तान’
हालांकि बड़े सैटेलाइट या अंतरिक्ष स्टेशन पूरी तरह नहीं जल पाते। ऐसे मामलों में उन्हें नियंत्रित तरीके से समुद्र में गिराया जाता है। इसके लिए पॉइंट निमो के पास एक क्षेत्र चुना गया है, जिसे “स्पेसक्राफ्ट कब्रिस्तान” कहा जाता है।
यह स्थान प्रशांत महासागर में है और पृथ्वी का सबसे दूरस्थ समुद्री इलाका माना जाता है। यहां से किसी भी जमीन की दूरी करीब 2,600 किलोमीटर से ज्यादा है और यह न्यूजीलैंड से भी हजारों किलोमीटर दूर है। इसलिए यहां गिरने वाले मलबे से किसी को खतरा नहीं होता। कई बड़े अंतरिक्ष यान जैसे मीर स्पेस स्टेशन और साल्यूट श्रृंखला के स्टेशन इसी इलाके में गिराए गए थे।
ऊंची कक्षाओं के सैटेलाइट का अलग तरीका
जो सैटेलाइट जियोस्टेशनरी ऑर्बिट में होते हैं, उन्हें पृथ्वी पर वापस लाने में बहुत ज्यादा ईंधन लगता है। इसलिए वैज्ञानिक उन्हें और ऊपर एक सुरक्षित कक्षा में भेज देते हैं, जिसे “ग्रेवयार्ड ऑर्बिट” कहा जाता है।
यह कक्षा सामान्य जियोस्टेशनरी कक्षा से लगभग 200–300 किलोमीटर ऊपर, यानी करीब 36 हजार किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर होती है। यहां पुराने सैटेलाइट सक्रिय सैटेलाइट से दूर रहते हैं और हजारों साल तक वहीं घूमते रह सकते हैं।
अंतरिक्ष में बढ़ रहा है कचरे का खतरा
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अनुसार पृथ्वी की कक्षा में आज हजारों सक्रिय सैटेलाइट के साथ लाखों छोटे-बड़े टुकड़े यानी स्पेस डेब्री भी मौजूद हैं।
इन टुकड़ों के टकराने से और ज्यादा मलबा बन सकता है, जिससे टकराव की एक खतरनाक श्रृंखला शुरू हो सकती है। इसे केसलर सिंड्रोम कहा जाता है। अगर यह स्थिति गंभीर हो गई तो संचार, जीपीएस और मौसम पूर्वानुमान जैसी कई महत्वपूर्ण सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
इसी वजह से वैज्ञानिक पुराने सैटेलाइट को सुरक्षित तरीके से हटाने की प्रक्रिया अपनाते हैं, ताकि अंतरिक्ष को “कचरे का मैदान” बनने से रोका जा सके।
