तीन शिकायतें, दो शासनादेश…फिर भी कार्रवाई नहीं, अब CM तक पहुंचा पंचायत चुनाव सुधार का मामला

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हल्द्वानी। उत्तराखंड में पंचायती राज व्यवस्था में सुधार की मांग अब प्रशासनिक सुस्ती पर बड़ा सवाल बन गई है। जिला पंचायत अध्यक्ष और क्षेत्र पंचायत प्रमुख (ब्लॉक प्रमुख) के प्रत्यक्ष चुनाव का प्रस्ताव लंबे समय से फाइलों में अटका है। तीन बार शिकायत और दो बार शासन के स्पष्ट आदेश के बावजूद कार्रवाई न होने से अब मामला सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंच गया है।

इस मुद्दे को सामाजिक कार्यकर्ता हेमंत सिंह गौनिया और सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गोविंद बल्लभ भट्ट लगातार उठा रहे हैं। दोनों ने मुख्यमंत्री को एक बार फिर शिकायती पत्र भेजते हुए स्पष्ट कर दिया है कि जब तक ठोस निर्णय नहीं होता, उनका प्रयास जारी रहेगा।

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प्रार्थीगण के मुताबिक, 13 मई 2025 को पहली बार विस्तृत प्रस्ताव भेजा गया था, जिसमें पंचायती राज अधिनियम में संशोधन कर प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली लागू करने की मांग की गई थी। इसके बाद दो अनुस्मारक पत्र भी भेजे गए, लेकिन किसी स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं हुई।

मामले की गंभीरता को देखते हुए शासन ने भी दो बार निर्देश जारी किए। 6 जून 2025 को अनु सचिव विमला धपवाल ने निदेशक पंचायती राज को कार्रवाई कर रिपोर्ट देने को कहा। इसके बाद 11 मार्च 2026 को दोबारा आदेश जारी कर शीघ्र आख्या मांगी गई। बावजूद इसके, संबंधित विभाग केवल फाइलों के आदान-प्रदान तक सीमित रहा और जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं दिखा।

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लगातार अनदेखी से नाराज प्रार्थीगण अब सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत RTI आवेदन भी दायर कर चुके हैं। उनका कहना है कि अब इस पूरे प्रकरण की सच्चाई सामने लाना जरूरी हो गया है। उनका आरोप है कि अधिकारी केवल औपचारिकता निभा रहे हैं और गंभीर मुद्दे को टाल रहे हैं।

इस मामले में जिला नैनीताल के पंचायत चुनावों का उदाहरण भी सामने रखा गया है, जहां जिला पंचायत सदस्यों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगे और मामला उच्च न्यायालय तक पहुंच गया। प्रार्थीगण का मानना है कि यदि प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली लागू होती, तो इस तरह के विवादों और अनियमितताओं पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती थी।

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पूरे प्रकरण में 73वें संविधान संशोधन, उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम 2016 और सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के उल्लंघन के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। अब मामला मुख्यमंत्री स्तर पर पहुंचने के बाद यह देखना अहम होगा कि प्रशासन कितनी तेजी से कार्रवाई करता है और क्या वाकई पंचायत चुनाव व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलता है।

फिलहाल, यह मुद्दा उत्तराखंड में पंचायत व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही की एक बड़ी परीक्षा बन गया है।

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