नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) को लेकर एक अहम और दूरगामी फैसला सुनाते हुए गोद लेने वाली महिलाओं को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अब केवल तीन महीने तक के शिशु को गोद लेने वाली ही नहीं, बल्कि उससे अधिक उम्र के बच्चों को गोद लेने वाली महिलाएं भी मातृत्व अवकाश की हकदार होंगी।
दरअसल, पहले लागू प्रावधान के तहत यदि कोई महिला तीन महीने तक के बच्चे को गोद लेती थी, तभी उसे 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलता था। सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 की धारा 60(4) में यह शर्त तय की गई थी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को भेदभावपूर्ण करार देते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह नियम भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य केवल जन्म या गोद लेने के शुरुआती चरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मां और बच्चे के बीच भावनात्मक जुड़ाव स्थापित करने और बच्चे की समुचित देखभाल सुनिश्चित करने के लिए भी आवश्यक है। ऐसे में बच्चे की उम्र के आधार पर इस अधिकार को सीमित करना तर्कसंगत नहीं है।
पीठ ने यह भी माना कि उम्र की सीमा के कारण उन महिलाओं के साथ अन्याय होता है, जो किसी कारणवश अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेती हैं। यह फैसला अब ऐसी महिलाओं के लिए समान अवसर और अधिकार सुनिश्चित करेगा।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को पितृत्व अवकाश (पैटरनिटी लीव) को लेकर भी ठोस और स्पष्ट कानून बनाने की सलाह दी है। कोर्ट ने कहा कि बच्चों के पालन-पोषण में पिता की भूमिका को भी संस्थागत रूप से मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि जिम्मेदारी केवल मां तक सीमित न रहे।
इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद देशभर में गोद लेने वाली महिलाओं को बड़ा लाभ मिलेगा और मातृत्व अवकाश को लेकर अब उम्र की बाध्यता समाप्त हो जाएगी।
