वॉशिंगटन। अमेरिका द्वारा 3 जनवरी को वेनेजुएला में किए गए कथित ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने स्पष्ट किया कि यह सैन्य कार्रवाई न तो तेल संसाधनों पर कब्जे के लिए थी और न ही सत्ता परिवर्तन के उद्देश्य से। उनका कहना था कि यह कदम “पृथ्वी पर शांति बनाए रखने” के लिए उठाया गया।
ट्रंप ने दावा किया कि इस ऑपरेशन के तहत अमेरिकी बलों ने राजधानी काराकास में कार्रवाई करते हुए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को हिरासत में लिया। उन्होंने इसे अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और सेना के बीच बेहतरीन तालमेल का नतीजा बताया और कहा कि इस जोखिमभरे मिशन में किसी भी अमेरिकी सैनिक की जान नहीं गई।
अपने फैसले को सही ठहराने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ने 1823 की ऐतिहासिक मोनरो डॉक्ट्रिन का हवाला दिया। उन्होंने इसे नए अंदाज में ‘डॉन-रो डॉक्ट्रिन’ नाम देते हुए कहा कि पश्चिमी गोलार्ध में शांति और स्थिरता बनाए रखना अमेरिका की प्राथमिक जिम्मेदारी है। ट्रंप ने आरोप लगाया कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने इस सिद्धांत को नजरअंदाज किया, लेकिन उनकी सरकार ऐसा नहीं करेगी।
मादुरो की गिरफ्तारी के बाद ट्रंप ने वेनेजुएला को एक “मृत देश” करार देते हुए कहा कि हालात पूरी तरह सुरक्षित होने तक अमेरिका वहां की स्थिति पर नजर रखेगा। साथ ही उन्होंने यह टिप्पणी भी की कि अगर वे चुनाव हार जाते, तो अमेरिका की हालत भी वेनेजुएला जैसी हो सकती थी।
अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, यह ऑपरेशन अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि महीनों की खुफिया तैयारियों के बाद अंजाम दिया गया। कार्रवाई से पहले वेनेजुएला के एयर डिफेंस सिस्टम को निष्क्रिय किया गया और फिर विशेष बलों को मैदान में उतारा गया। हिरासत में लिए गए मादुरो को न्यूयॉर्क ले जाया गया है, जहां उन पर नार्को-टेररिज्म और ड्रग तस्करी से जुड़े मामलों में मुकदमा चलाने की बात कही जा रही है।
हालांकि, अमेरिका की इस कथित सैन्य कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताते हुए वेनेजुएला की संप्रभुता पर हमला करार दिया है। वैश्विक राजनीति में इस कदम के दूरगामी असर को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
