हल्द्वानी/रुद्रपुर। कुमाऊं मंडल में टैक्स चोरी का खेल अब और ज्यादा शातिर तरीके से खेला जा रहा है। बाहरी राज्यों से बिना बिल और टैक्स के आने वाला माल अब किराये के ट्रकों में ढोया जा रहा है, ताकि जांच एजेंसियों की नजरों से बचा जा सके। सूत्रों का दावा है कि कथित ट्रांसपोर्ट एजेंटों ने अपने वाहनों का इस्तेमाल लगभग बंद कर दिया है, क्योंकि वे बार-बार चेकिंग में पकड़े जाने लगे थे।
अब किराये के ट्रकों का सहारा लेकर टैक्स चोरी का यह नेटवर्क बेखौफ तरीके से चल रहा है। सवाल यह है कि क्या यह सब बिना ‘अंदरूनी ढील’ के संभव है?
बताया जा रहा है कि गुटका (तंबाकू) और पान मसाला जैसे हाई-टैक्स वाले उत्पाद इस पूरे खेल के केंद्र में हैं। सरकार द्वारा भारी टैक्स लगाए जाने के बाद इनकी कालाबाजारी तेजी से बढ़ी है और इसी का फायदा उठाकर कथित टैक्स माफिया मोटा मुनाफा कमा रहा है।
खेल का तरीका बेहद चालाकी भरा है। पहले एक ट्रक में वैध बिल के साथ गुटका (तंबाकू) और पान मसाला का माल भेजा जाता है, फिर उसी बिल की दूसरी कॉपी का इस्तेमाल कर उसी ट्रक से दोबारा टैक्स चोरी का माल पहुंचाया जाता है। यानी एक ही दिन में एक ही ट्रक से दो-दो चक्कर लगवाकर सिस्टम को चकमा दिया जा रहा है। जांच के दौरान कागज दुरुस्त होने से अधिकारी भी कई बार गुमराह हो जाते हैं और कारोबारी बच निकलते हैं।
सूत्रों के अनुसार, बरेली, दिल्ली, गाजियाबाद समेत अन्य राज्यों से आने वाले परचून, कपड़ा, जूता और कॉस्मेटिक के ट्रकों में भी गुटका छिपाकर लाया जा रहा है। वजह साफ है इन सामानों के मुकाबले गुटका में कई गुना ज्यादा मुनाफा है, इसलिए तस्करी का जोखिम उठाया जा रहा है।
यह अवैध माल सबसे पहले रुद्रपुर, काशीपुर और किच्छा की कथित ट्रांसपोर्ट लाइनों में उतारा जाता है। इसके बाद छोटे वाहनों के जरिए इसे हल्द्वानी और आसपास के बाजारों में खपाया जाता है। हल्द्वानी के ट्रांसपोर्ट नगर, बरेली रोड और रामपुर रोड इस नेटवर्क के अहम ठिकाने बनते जा रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब यह पूरा खेल खुलेआम चल रहा है, तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? सूत्रों का दावा है कि संबंधित विभाग के अधिकारी इस पूरे नेटवर्क से भलीभांति वाकिफ हैं, लेकिन इसके बावजूद ठोस कार्रवाई का अभाव कई तरह के संदेह पैदा करता है।
इस संगठित टैक्स चोरी से जहां सरकार को करोड़ों का राजस्व नुकसान हो रहा है, वहीं ईमानदार कारोबारियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल होता जा रहा है। अब निगाहें प्रशासन पर हैं क्या ‘टैक्स माफिया’ पर शिकंजा कसेगा या फिर यह खेल यूं ही चलता रहेगा?
