नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में एचआईवी अब भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बना हुआ है। दिल्ली स्टेट एड्स कंट्रोल सोसायटी (DSACS) और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में करीब 60 हजार लोग एचआईवी के साथ जीवन जी रहे हैं, जबकि हर साल औसतन तीन हजार नए संक्रमण सामने आ रहे हैं। वर्ष 2023 में एचआईवी से जुड़ी जटिलताओं के कारण एक हजार से अधिक लोगों की मौत दर्ज की गई थी।
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग में एचआईवी की प्रसार दर 0.31 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक मानी जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि असुरक्षित यौन संबंध, संक्रमित सुई का इस्तेमाल, नशे की लत और समय पर जांच न कराना संक्रमण फैलने के प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा सामाजिक भय और भेदभाव के चलते कई मरीज अपनी बीमारी छिपा लेते हैं, जिससे इलाज में देरी हो जाती है।
आंकड़ों के मुताबिक राजधानी में 36,588 पुरुष, 22,281 महिलाएं और 1,355 बच्चे एचआईवी से संक्रमित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रवासी मजदूर, ट्रक चालक, नशा करने वाले और हाई-रिस्क ग्रुप में संक्रमण का खतरा अधिक पाया गया है।
दिल्ली में एचआईवी मरीजों के इलाज और जांच के लिए 12 एंटीरेट्रोवायरल ट्रीटमेंट (ART) सेंटर, 465 इंटीग्रेटेड काउंसलिंग एंड टेस्टिंग सेंटर (ICTC) और 79 टार्गेटेड इंटरवेंशन प्रोजेक्ट संचालित किए जा रहे हैं। इसके बावजूद रिपोर्ट में सामने आया है कि राजधानी में केवल करीब 70 प्रतिशत मरीज ही नियमित इलाज से जुड़े हैं, जबकि बड़ी संख्या में संक्रमित अब भी उपचार से बाहर हैं।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, गर्भवती महिलाओं में समय पर एचआईवी जांच न होने से मां से बच्चे में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। ईएमटीसीटी योजना के तहत दिल्ली में सैकड़ों मामलों में इलाज की जरूरत सामने आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते जांच और दवा से इस संक्रमण को पूरी तरह रोका जा सकता है।
गुरु तेग बहादुर अस्पताल के एडिशनल मेडिकल सुप्रिटेंडेंट डॉ. प्रवीन कुमार ने कहा कि “एचआईवी अब मौत की बीमारी नहीं है। समय पर जांच और नियमित इलाज से मरीज सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकता है।”
