मौत भी कर्ज बन गई थी…एक फोन कॉल ने खोले बंद दरवाजे, SSP की संवेदनशीलता से पति को मिला अंतिम विदाई का हक

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हल्द्वानी: एक पति… एक टूटा हुआ दिल… और पत्नी की देह, जिसे वह आख़िरी बार सम्मान के साथ विदा करना चाहता था।
लेकिन इलाज के बाद मौत भी जैसे कर्ज बन गई।

03 जनवरी 2026 की रात अल्मोड़ा के धारानौला क्षेत्र निवासी नंदन विरौड़िया के जीवन की सबसे अंधेरी रात थी। पत्नी सीमा विरौड़िया को बचाने के लिए उन्होंने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर कोशिश की। बेस अस्पताल अल्मोड़ा से रेफर कर हल्द्वानी के चंदन अस्पताल तक लाए। इलाज चला, उम्मीदें बंधीं और 57 हजार रुपये भी चुकाए गए… लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था।

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सीमा की सांसें थम गईं…और यहीं से नंदन की पीड़ा और बढ़ गई। अस्पताल प्रबंधन ने इलाज के बाद 30 हजार रुपये और जमा करने की शर्त रख दी। पैसे नहीं देने पर पत्नी का शव देने से इनकार कर दिया गया। पति के सामने उसकी पत्नी की पार्थिव देह थी, लेकिन वह उसका अंतिम संस्कार तक नहीं कर पा रहा था। आंसू बह रहे थे, हाथ जुड़े थे, मगर दरवाज़े बंद थे।

बेबस नंदन ने आख़िरी उम्मीद के रूप में देर रात SSP नैनीताल डॉ. मंजुनाथ टी.सी. को फोन किया। उस फोन कॉल में सिर्फ शिकायत नहीं थी, एक टूटे इंसान की कराह थी।

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दूसरी ओर एक अधिकारी नहीं, एक संवेदनशील इंसान था। पीड़ा सुनकर एसएसपी भावुक हो उठे और बिना एक पल गंवाए इंसानियत को कानून से आगे रखा। तुरंत सीओ सिटी हल्द्वानी अमित कुमार और कोतवाली प्रभारी विजय मेहता को कार्रवाई के निर्देश दिए गए।

पुलिस टीम रात में ही अस्पताल पहुंची। शव को परिजनों के सुपुर्द कराया गया, मृत्यु प्रमाण पत्र दिलाया गया और उस पति को उसकी पत्नी को सम्मान के साथ विदा करने का हक मिला।

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अस्पताल प्रबंधन को भी सख़्त शब्दों में चेताया गया कि मौत के बाद सौदेबाज़ी इंसानियत पर धब्बा है, और भविष्य में ऐसी अमानवीय हरकत बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

यह घटना सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि यह याद दिलाने वाली कहानी है कि जब हर दरवाजा बंद हो जाए, तब इंसानियत का एक दरवाजा खुलना ही किसी परिवार के लिए जीवन भर की राहत बन जाता है। उस रात एक पति अपनी पत्नी को खो चुका था…लेकिन उसने यह जरूर महसूस किया कि सिस्टम में अभी इंसान जिन्दा है।