म्यांमार में सेना का ‘संवैधानिक कब्जा’…मिन आंग ह्लाइंग बने राष्ट्रपति, लोकतंत्र पर गहराया संकट

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नेपीडॉ। म्यांमार में सैन्य शासन ने सत्ता पर अपनी पकड़ को और मजबूत करते हुए उसे अब औपचारिक और संवैधानिक रूप दे दिया है। साल 2021 में लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट करने वाले मिन आंग ह्लाइंग अब आधिकारिक तौर पर देश के नए राष्ट्रपति बन गए हैं। शुक्रवार को सैन्य-समर्थित संसद में हुए एकतरफा मतदान में उन्होंने बहुमत हासिल कर लिया, जिसके बाद देश की कमान पूरी तरह उनके हाथों में आ गई है।

69 वर्षीय ह्लाइंग की जीत पहले से तय मानी जा रही थी, क्योंकि मौजूदा संसद में सेना का पूर्ण वर्चस्व है। कुल 584 मतों में से उन्हें 293 वोट मिले, जो बहुमत के लिए पर्याप्त थे। म्यांमार के विवादित संविधान के तहत संसद की एक-चौथाई सीटें सीधे सैन्य अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं, जिससे किसी भी नागरिक दल के लिए सेना की सहमति के बिना सत्ता तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाता है।

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हाल ही में हुए चुनावों में सेना समर्थित यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) ने 80% से अधिक सीटों पर कब्जा जमाया, जिसे पश्चिमी देशों ने ‘चुनावी ढोंग’ करार दिया है। जानकारों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम तानाशाही को लोकतंत्र के आवरण में पेश करने की रणनीति का हिस्सा है।

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फरवरी 2021 में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू की की चुनी हुई सरकार को हटाने के बाद से ही ह्लाइंग देश के वास्तविक शासक बने हुए थे। राष्ट्रपति बनने से पहले उन्होंने सेना में बड़ा फेरबदल करते हुए अपने करीबी और पूर्व खुफिया प्रमुख ये विन ओ को नया सेना प्रमुख नियुक्त किया। इस कदम को सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

हालांकि, राजधानी नेपीडॉ में सत्ता का औपचारिक हस्तांतरण हो चुका है, लेकिन जमीनी हालात अब भी गंभीर बने हुए हैं। देश का बड़ा हिस्सा गृहयुद्ध की आग में झुलस रहा है। इस बीच सू की की पार्टी के बचे हुए नेताओं और जातीय सशस्त्र समूहों ने मिलकर एक संयुक्त मोर्चा बनाया है, जिसने सैन्य शासन को खत्म करने का संकल्प लिया है।

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विश्लेषकों का मानना है कि अब चीन और आसियान जैसे क्षेत्रीय खिलाड़ी नए सत्ता समीकरणों के तहत संबंध सुधारने की कोशिश कर सकते हैं। हालांकि, जारी संघर्ष, आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध ह्लाइंग के कार्यकाल को चुनौतीपूर्ण बना सकते हैं।

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