चुनाव आयुक्तों को आजीवन कानूनी छूट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, संवैधानिक वैधता की होगी जांच

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विवादास्पद कानून पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस, चार हफ्ते में मांगा जवाब

नई दिल्ली। संसद द्वारा पारित उस कानून पर अब सुप्रीम कोर्ट की पैनी नजर है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके फैसलों के लिए आजीवन कानूनी अभियोजन से छूट देने का प्रावधान किया गया है। शीर्ष अदालत ने इस कानून की संवैधानिक वैधता की जांच करने पर सहमति जताते हुए गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि क्या चुनाव आयोग को ऐसी विशेष कानूनी सुरक्षा दी जा सकती है, जो संविधान के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल को भी पूरी तरह प्राप्त नहीं है।

Constitutional Validity Under Scanner: इस अहम मामले की सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष हुई। गैर-सरकारी संगठन ‘लोक प्रहरी’ की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सभी पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने संकेत दिए कि मामला लोकतंत्र और संवैधानिक संतुलन से जुड़ा है, इसलिए इसकी गहन जांच आवश्यक है।

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याचिका में ‘लोक प्रहरी’ ने तर्क दिया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों को उनके पद पर रहते हुए लिए गए फैसलों के लिए इस तरह की पूर्ण कानूनी सुरक्षा देना अनुचित है। इससे जवाबदेही समाप्त होने का खतरा पैदा होता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था का संतुलन बिगड़ सकता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

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गौरतलब है कि केंद्र की मोदी सरकार वर्ष 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति व सेवा शर्तों से जुड़ा यह कानून लेकर आई थी, जिसे संसद के दोनों सदनों से पारित कराया गया। कानून के प्रावधानों के अनुसार, चुनाव आयुक्तों द्वारा अपनी आधिकारिक ड्यूटी के दौरान लिए गए फैसलों, आदेशों या बयानों को लेकर किसी भी अदालत में एफआईआर या मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता। यह सुरक्षा न केवल कार्यकाल के दौरान, बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद भी लागू रहती है।

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इस कानून का संसद में भी तीखा विरोध हुआ था। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने इसे लोकतांत्रिक जवाबदेही के खिलाफ बताया था। अब सुप्रीम कोर्ट में भी इस कानून को चुनौती देते हुए कहा गया है कि इस तरह की ‘ब्लैंकेट इम्यूनिटी’ से संवैधानिक संस्थाओं की पारदर्शिता और उत्तरदायित्व पर सवाल खड़े होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अब सबकी निगाहें केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के जवाब पर टिकी हैं। आने वाली सुनवाई में अदालत यह तय करेगी कि चुनाव आयुक्तों को दिया गया यह कानूनी सुरक्षा कवच संविधान की भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है या नहीं।