लंदन/नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ब्रिटेन ने बड़ा और स्पष्ट रुख अपनाते हुए खुद को संभावित सैन्य टकराव से अलग रखने का फैसला किया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने साफ कहा है कि उनका देश ईरान के खिलाफ अमेरिका और इज़राइल के किसी भी आक्रामक सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं बनेगा।
प्रधानमंत्री स्टार्मर ने दो टूक शब्दों में कहा, “यह हमारी लड़ाई नहीं है। हम अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा को सर्वोपरि रखेंगे।” उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब नाटो सहयोगी देशों की ओर से ब्रिटेन पर इस संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाने का दबाव लगातार बढ़ रहा था।
हालांकि, ब्रिटेन ने पूरी तरह हाथ नहीं खींचे हैं। लंदन ने साइप्रस स्थित अपने रणनीतिक सैन्य अड्डे RAF अक्रोतिरी का सीमित उपयोग अमेरिका को करने की अनुमति दी है। लेकिन इसके साथ सख्त शर्तें भी जोड़ी गई हैं। ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस बेस का इस्तेमाल केवल रक्षात्मक कार्यों—जैसे मिसाइल और ड्रोन हमलों को नाकाम करने—तक ही सीमित रहेगा।
सूत्रों के मुताबिक, हाल के दिनों में रॉयल एयर फोर्स ने खाड़ी क्षेत्र में सहयोगियों की मदद करते हुए कुछ संदिग्ध ड्रोन को मार गिराया है। यह कदम ब्रिटेन की “सीमित भागीदारी” की रणनीति को दर्शाता है, जिसमें वह सीधे युद्ध में उतरे बिना अपने सहयोगियों को समर्थन दे रहा है।
उधर, डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिटेन के इस रुख पर नाराजगी जताई है। ट्रंप का कहना है कि सैन्य ठिकानों के “असीमित उपयोग” की अनुमति न देना दोनों देशों के पारंपरिक और मजबूत रिश्तों में दरार का संकेत हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन का यह फैसला पूरी तरह रणनीतिक और आर्थिक संतुलन को ध्यान में रखकर लिया गया है। अगर यह संघर्ष और बढ़ता है और होर्मुज जलडमरूमध्य या स्वेज नहर जैसे अहम समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं, तो तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है। इसका सीधा असर ब्रिटेन समेत पूरे यूरोप की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा और ईंधन कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
ऐसे में ब्रिटेन ने साफ संकेत दे दिया है कि वह कूटनीतिक संतुलन बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा को प्राथमिकता देगा न पूरी तरह युद्ध में उतरेगा और न ही सहयोगियों से दूरी बनाएगा।
