‘भाड़ा पर्ची’ का काला खेल: तीन गुना किराया, 10% कमीशन…किसके संरक्षण में फल-फूल रहा सिंडिकेट?

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लक्ष्मण मेहरा, हल्द्वानी। कुमाऊं मंडल में कच्चे माल (टैक्स चोरी) की ढुलाई के नाम पर चल रहा “भाड़ा पर्ची” का खेल अब खुलकर सामने आ गया है। जनपद ऊधमसिंह नगर के रुद्रपुर, किच्छा और काशीपुर से लेकर हल्द्वानी तक फैले टैक्स चोरी के इस नेटवर्क ने पूरे ट्रांसपोर्ट सिस्टम की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कुछ ट्रांसपोर्ट एजेंटों की मनमानी और कथित गठजोड़ के चलते यह अवैध सिंडिकेट बेखौफ तरीके से संचालित हो रहा है।

सूत्रों के मुताबिक, “कच्चे” यानी सिर्फ भाड़ा पर्ची पर चलने वाले टैक्स चोरी के माल में कुछ ट्रांसपोर्ट एजेंटों का प्रति वाहन करीब 10 प्रतिशत कमीशन तय होता है। यही वजह है कि यह नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा है। हालात यह हैं कि पक्के बिल और बिल्टी के साथ जो माल करीब 400 रुपये प्रति नग किराये में ढोया जाता है, वहीं टैक्स चोरी का माल “भाड़ा पर्ची” में 1200 से 1500 रुपये तक किराये में पहुंच रहा है—यानी सीधे-सीधे तीन गुना वसूली।

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बताया जा रहा है कि दिल्ली, बरेली, गाजियाबाद, यूपी बॉर्डर, पंजाब, हरियाणा समेत अन्य राज्यों से आने वाले अधिकांश टैक्स चोरी के माल की बुकिंग “कच्चे” में की जाती है। टैक्स चोरी के माल की बुकिंग करने वाले को सिर्फ एक भाड़ा पर्ची थमा दी जाती है। न कोई बिल, न बिल्टी यानि पूरा खेल ऑफ रिकॉर्ड चलता है, जिससे टैक्स चोरी को खुली छूट मिलती है।

इस पूरे नेटवर्क की सबसे मजबूत कड़ी बंद बॉडी ट्रक हैं। इन ट्रकों में टैक्स चोरी के माल की वास्तविक मात्रा और विवरण को आसानी से छुपा लिया जाता है, जिससे जांच एजेंसियों की पकड़ से बचना आसान हो जाता है।

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सूत्रों का दावा है कि उत्तराखंड राज्य की सीमाओं में प्रवेश करते ही ट्रक पहले रुद्रपुर, किच्छा और काशीपुर की कुछ ट्रान्सपोर्टों में टैक्स चोरी का माल उतारते हैं। इसके बाद यही माल छोटे-बड़े वाहनों के जरिए हल्द्वानी के ट्रांसपोर्ट नगर, रामपुर रोड और बरेली रोड की कुछ ट्रान्सपोर्टों में पहुंचाया जाता है, जहां से पहाड़ लाइन के ट्रांसपोर्ट एजेंटों के माध्यम से इसे आगे पहाड़ी जिलों में भेज दिया जाता है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जब भी उत्तराखंड बॉर्डर पर वाहनों की चेकिंग होती है, तो ज्यादातर पक्के यानी बिल-बिल्टी वाले ट्रकों को ही रोका जाता है। जबकि टैक्स चोरी के माल से लदे ट्रकों के चालकों को पहले ही “लोकेशन” के जरिए अलर्ट कर दिया जाता है, जिससे वे जांच से बच निकलते हैं। इससे पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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अब बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह सब जिम्मेदार विभागों की नजरों के सामने कैसे चल रहा है? क्या यह केवल लापरवाही है या फिर सुनियोजित मिलीभगत?

“भाड़ा पर्ची” के इस टैक्स चोरी के खेल से सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है, जबकि ट्रांसपोर्ट सिंडिकेट मोटा मुनाफा कमा रहा है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस संगठित नेटवर्क पर कब और कितना सख्त शिकंजा कसता है।