गलवान के बाद चीन ने किया गुप्त परमाणु परीक्षण, अमेरिका का सनसनीखेज दावा

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बीजिंग/न्यूयॉर्क : अमेरिका ने चीन पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि उसने वर्ष 2020 में भूकंपीय निगरानी प्रणालियों से बचने के लिए विशेष तकनीक का इस्तेमाल कर गुप्त परमाणु विस्फोटक परीक्षण किया। यह कथित परीक्षण 15 जून 2020 को गलवान घाटी में भारत-चीन के बीच हुई हिंसक झड़प के ठीक एक सप्ताह बाद किया गया था। इस खुलासे के बाद अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।

America makes shocking claim: ‘China conducted nuclear test after Galwan clash’: अमेरिकी विदेश उप-सचिव थॉमस जी. डिनानो ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए दावा किया कि 22 जून 2020 को चीन ने परमाणु विस्फोटक परीक्षण किया। गौरतलब है कि 15 जून 2020 को गलवान घाटी में हुई झड़प में भारत के 20 जवान शहीद हुए थे, जबकि 30 से अधिक चीनी सैनिकों के मारे जाने की खबरें सामने आई थीं। अमेरिकी दावे के मुताबिक, यह परीक्षण उसी तनावपूर्ण माहौल के बीच किया गया।

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डिनानो ने आरोप लगाया कि चीन ने ‘डीकपलिंग’ तकनीक का उपयोग किया, जिससे भूमिगत परमाणु विस्फोट से निकलने वाली भूकंपीय तरंगों को कम किया जा सके। विशेषज्ञों के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में 1 किलोटन तक के भूमिगत विस्फोट भी वैश्विक निगरानी नेटवर्क द्वारा दर्ज किए जा सकते हैं, लेकिन डीकपलिंग तकनीक से सिग्नल की तीव्रता कई गुना कम की जा सकती है।

क्या है ‘डीकपलिंग’ तकनीक?
‘डीकपलिंग’ एक ऐसी तकनीक मानी जाती है, जिसमें परमाणु विस्फोट को बड़े भूमिगत कक्ष या विशेष संरचना में किया जाता है ताकि उत्पन्न झटकों को अवशोषित किया जा सके। इससे भूकंपीय सेंसरों के लिए विस्फोट का पता लगाना कठिन हो जाता है। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती माना जाएगा।

न्यू START संधि पर भी उठे सवाल
डिनानो ने सामरिक शस्त्र न्यूनीकरण संधि (New START) का जिक्र करते हुए कहा कि 2010 में अमेरिका और रूस के बीच हुए इस समझौते के तहत 1,550 तैनात रणनीतिक वॉरहेड्स और 700 लॉन्चर्स की सीमा तय की गई थी। हालांकि 2026 के बाद इन सीमाओं का भविष्य अनिश्चित है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की अधिकांश तैनात परमाणु क्षमताएं इस संधि के दायरे में थीं, जबकि रूस के विशाल भंडार का सीमित हिस्सा ही इसमें शामिल था। चीन इस संधि का हिस्सा नहीं है।

एशिया-प्रशांत में बढ़ सकता है तनाव
विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिकी आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। भारत-चीन संबंध पहले से ही संवेदनशील रहे हैं और ऐसे दावे क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को और जटिल बना सकते हैं।

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फिलहाल चीन की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें अब आने वाली कूटनीतिक प्रतिक्रियाओं और संभावित जांच पर टिकी हैं।