नेपीडॉ: म्यांमार में आए 7.7 तीव्रता के भूकंप से मरने वालों की संख्या बढ़कर 2,719 हो गई है, जबकि 4,521 लोग घायल हुए हैं और 441 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री मिन आंग ह्लाइंग ने यह जानकारी दी।
सेना ने युद्ध विराम से किया इनकार
इस विनाशकारी आपदा के बीच, म्यांमार के जुंटा प्रमुख आंग ह्लाइंग ने जातीय सशस्त्र संगठनों (ईएओ) के युद्ध विराम प्रस्ताव को खारिज कर दिया और सैन्य अभियान जारी रखने की घोषणा की।
मंगलवार को ह्लाइंग ने कहा, “कुछ जातीय सशस्त्र समूह अभी सक्रिय रूप से लड़ाई में शामिल नहीं हो रहे, लेकिन वे हमलों की तैयारी कर रहे हैं और प्रशिक्षण ले रहे हैं। यह आक्रामकता का एक रूप है, इसलिए सेना आवश्यक रक्षा अभियान जारी रखेगी।”
भूकंप राहत पर असर डाल रहे सैन्य हमले
म्यांमार नाउ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब वैश्विक समुदाय भूकंप राहत और मानवीय सहायता पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, तब म्यांमार की सेना देशभर में प्रतिरोधी समूहों के खिलाफ अपने हमले जारी रखे हुए है।
अमेरिका स्थित एडवोकेसी ग्रुप ह्यूमन राइट्स वॉच ने म्यांमार की सैन्य सरकार से अपील की है कि वह भूकंप पीड़ितों के लिए निर्बाध मानवीय सहायता पहुंच की अनुमति दे और आपातकालीन राहत कार्यों में बाधा डालने वाले प्रतिबंध हटाए।
सैन्य हमले और इंटरनेट ब्लैकआउट बढ़ा रहे संकट
28 मार्च को आए भूकंप के बाद से, सेना ने हवाई हमले तेज कर दिए हैं और गंभीर रूप से प्रभावित इलाकों में इंटरनेट सेवाएं बाधित कर दी हैं। इससे राहत कार्यों में गंभीर अड़चनें आ रही हैं।
“भय के माहौल में राहत कार्य मुश्किल”
ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया उप निदेशक ब्रायोनी लाउ ने कहा, “म्यांमार की सैन्य सरकार अब भी भय और आतंक फैला रही है, भले ही यह भीषण प्राकृतिक आपदा क्यों न हो, जिसमें हजारों लोग मारे गए और घायल हुए हैं। सरकार को इस रवैये से बाहर आकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में फंसे लोगों को शीघ्र राहत मिले।”
उन्होंने यह भी कहा कि “म्यांमार की सेना पर इतनी बड़ी आपदा से निपटने का भरोसा नहीं किया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और सरकारों को सेना पर दबाव डालना चाहिए कि वह प्रभावित क्षेत्रों तक पूरी और तत्काल मानवीय सहायता की पहुंच सुनिश्चित करे।”
राहत कार्यों में देरी बनी चिंता का विषय
भूकंप के कारण हजारों लोग बेघर हो चुके हैं और प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी देखी जा रही है। राहत संगठनों का कहना है कि अगर सैन्य हमले और प्रतिबंध जारी रहे, तो पीड़ितों को आवश्यक सहायता मिलने में और देरी हो सकती है, जिससे हालात और बिगड़ सकते हैं।